कपास के पौधे
विजयशंकर चतुर्वेदी
| जैसे असंख्य लोग बैठ गए हों छतरियाँ खोलकर पौधों को नहीं पता उनके किसान ने कर ली है आत्महत्या कोई नहीं आएगा उन्हें अगोरने कोई नहीं ले जाएगा खलिहान तक सोच रहे हैं पौधे उनसे निकलेगी धूप-सी रुई धुनी जाएगी बनेगी बच्चों का झबला
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