लॉकडाउन में घर पर करें ये 5 आसन

अनिरुद्ध जोशी| Last Updated: बुधवार, 15 अप्रैल 2020 (15:46 IST)
में घर से कहीं भी बाहर निकलना कहीं हो पा रहा है। घूमन फिरना या टहलना बंद हो गया है। यदि आप डायबिटीज के मरीज हैं तो आपकी परेशानी बढ़ गई होगी। नहीं हैं तो भी खाना पचने में समस्या हो रही है। बहुत ज्यादा आराम करने से भी शरीर जाम होकर अस्वस्थ हो जाता है। ऐसे में शरीर को स्वस्थ रखना जरूरी है। तो आओ जानते हैं 5 आसान योगासन।

1. : घर में ही आप अच्छे से योग करते रहेंगे तो आप स्वस्थ रहेंगे और आपका वजन भी नहीं बढ़ेंगे। योग में आप सूर्यनमस्कार की 12 स्टेप को 12 बार करें और दूसरा यह कि कम से कम 5 मिनट का अनुलोम विलोम प्रणायाम करें। उक्त संपूर्ण क्रिया को करने में मात्र 15 से 20 मिनट ही लगते हैं। आप नहीं जानते हैं कि यह आपके लिए कितनी फायदेमंद साबित होगी। यदि ये नहीं कर सकते तो निम्नलिखित आसन करें। लेकिन डायबिटीज के मरीज हैं तो अवश्य करें।


2. : संस्कृत शब्द वज्र का अर्थ होता है कठोर। वज्र को अंग्रेजी में थंडरबोल्ट या डायमंड कहते हैं। यह एक मात्र आसन है जिसे भोजन करने के तुरंत बाद भी किया जा सकता है। इससे भोजन आसानी से पचता है। यह पैरों की माँसपेशियों को मजबूत बनाता है। इससे रीढ़ की हड्डी और कंधे सीधे होते हैं। शरीर में रक्त-संचार समरस होता है और इस प्रकार शिरा के रक्त को धमनी के रक्त में बदलने का रोग नहीं हो पाता।


आसन विधि : बैठकर दोनों पैर सामने सीधा करें फिर पहले दाहिने हाथ से दाहिने पैर के पंजे को पकड़कर घुटना मोड़ते हुए एड़ी नितंब के नीचे रखे। इसी तरह बाएं पैर के घुटने को मोड़कर नितंबों के ‍नीचे रखें। हाथों की हथेलियों को घुटनों पर रखें। रीड़ की हड्डी़ और गर्दन सीधी रखें। सामने देंखें। इस स्थिति में कम से कम तीन मिनट बैठना चाहिए। फिर साँस छोड़ते हुए पुन: क्रमश: पैरों को सामने सीधाकर आराम की स्थिति में आ जाएं।

नोट : वज्रासन को तब तक किया जा सकता है जब तक कि पैरों में किसी प्रकार का ‍खींचाव न हो। इस दो से चार बार कर सकते हैं। घुटनों में दर्द होने की स्थिति में यह आसन न करें।


3. : डायबिटीज के मरीजों के लिए यह बहुत अच्छा आसन है। हालांकि कुर्मासन भी किया जा सकता है। यह आसन पेन्क्रियाज को सक्रिय करके डायबिटीज को कम करने में लाभकारी है। क्योंकि इसके अभ्यास से पेट का उत्तम व्यायाम होता है। जठराग्नि प्रदीप्त होती है तथा गैस, अपचन व कब्ज आदि उदर रोग भी मिट जाते हैं।


विधि : सर्वप्रथम दंडासन में बैठते हुए वज्रासन में बैठ जाएं फिर दोनों हाथों की मुठ्ठी बंद कर लें। मुठ्ठी बंद करते समय अंगूठे को अंगुलियों से अंदर दबाइए। फिर दोनों मुठ्ठियों को नाभि के दोनों ओर लगाकर श्वास बाहर निकालते हुए सामने झुकते हुए ठोड़ी को भूमि पर टिका दें। थोड़ी देर इसी स्थिति में रहने के बाद वापस वज्रासन में आ जाए।मंडूकासन करने के बाद उष्ट्रासन जरूर करें।


4. : संस्कृत शब्द आंजनेय का अर्थ होता है अभिवादन या स्तुति। हनुमान जी का एक नाम आंजनेय भी है। अंग्रेजी में आजकल इसे Salutation Pose कहते हैं। यह आसन उसी तरह किया जाता है जिस तरह हनुमानजी अपने एक पैर का घुटना नीचे टिकाकर दूसरा पैर आगे रखकर कमर पर हाथ रखते हैं।

अंजनेय आसन में और भी दूसरे आसन और मुद्राओं का समावेश है। इससे छाती, हथेलियां, गर्दन और कमर को लाभ मिलता है। इसका नियमित अभ्यास करने से जीवन में एकाग्रता और संतुलन बढ़ता है।


विधि : सर्वप्रथम वज्रासन में आराम से बैठ जाएँ। धीरे से घुटनों के बल खड़े होकर पीठ, गर्दन, सिर, कूल्हों और जांघों को सीधा रखें। हाथों को कमर से सटाकर रखें सामने देंखे। अब बाएं पैर को आगे बढ़ाते हुए 90 डिग्री के कोण के समान भूमि कर रख दें। इस दौरान बायां हाथ बाएं पैर की जंघा पर रहेगा।


फिर अपने हाथों की हथेलियों को मिलाते हुए हृदय के पास रखें अर्थात नमस्कार मुद्रा में रखें। श्वास को अंदर खींचते हुए जुड़ी हुई हथेलियों को सिर के ऊपर उठाकर हाथों को सीधा करते हुए सिर को पीछे झुका दें। इसी स्थिति में धीरे-धीरे दाहिना पैर पीछे की ओर सीधा करते हुए कमर से पीछे की ओर झुके। इस अंतिम स्थिति में कुछ देर तक रहे। फिर सांस छोड़ते हुए पुन: वज्रासन की मुद्रा में लौट आए। इसी तरह अब यही प्रक्रिया दाएं पैर को 90 डिग्री के कोण में सामने रखते हए करें।

नोट : पेट और पैरों में किसी प्रकार की कोई गंभीर समस्या होतो यह आसन योग शिक्षक की सलाह पर ही करें। इस आसन की अंतिम स्टेप में एक मिनट तक रह सकते हैं और इसे दो बार कर सकते हैं।


5. : शव का अर्थ होता है मुर्दा अर्थात अपने शरीर को मुर्दे समान बना लेने के कारण ही इस आसन को शवासन कहा जाता है। श्वास की स्थिति में हमारा मन शरीर से जुड़ा हुआ रहता है, जिससे कि शरीर में किसी प्रकार के बाहरी विचार उत्पन्न नहीं होते। इस कारण से हमारा मन पूर्णत: आरामदायक स्थिति में होता हैं, तब शरीर स्वत: ही शांति का अनुभव करता है। आंतरिक अंग सभी तनाव से मुक्त हो जाते हैं, जिससे कि रक्त संचार सुचारु रूप से प्रवाहित होने लगता है। और जब रक्त सुचारु रूप से चलता है तो शारीरिक और मानसिक तनाव घटता है। खासकर जिन लोगों को उच्च रक्तचाप और अनिद्रा की शिकायत है, ऐसे मरीजों को शवासन अधिक लाभदायक है।

विधि : पीठ के बल लेटकर दोनों पैरों में ज्यादा से ज्यादा अंतर रखते हैं। पैरों के पंजे बाहर और एड़ियां अंदर की ओर रखते हैं। दोनों हाथों को शरीर से लगभग छह इंच की दूरी पर रखते हैं। हाथों की अंगुलियां मुड़ी हुई, गर्दन सीधी रहती है। आंखें बंद रखते हैं।

शवासन में सबसे पहले पैर के अंगूठे से लेकर सिर तक का भाग ढीला छोड़ देते हैं। पूरा शरीर ढीला छोड़ने के बाद सबसे पहले मन को श्वास-प्रश्वास के ऊपर लगाते हैं और हम मन के द्वारा यह महसूस करते हैं कि दोनों नासिकाओं से श्‍वास अंदर जा रही है तथा बाहर आ रही है। जब श्वास अंदर जाती है तब नासिका के अग्र में हलकी-सी ठंडक महसूस होती है और जब हम श्वास बाहर छोड़ते हैं तब हमें गरमाहट की अनुभूति होती हैं। इस गर्माहट व ठंडक को अनुभव करें।

इस तरह नासाग्रस से क्रमश: सीने तथा नाभि पर ध्यान केंद्रित करें। मन में उल्टी गिनती गिनते जाएँ। 100 से लेकर 1 तक। यदि गलती हो जाए तो फिर से 100 से शुरू करें। ध्यान रहे कि आपका ध्यान सिर्फ शरीर से लगा हुआ होना चाहिए, मन में चल रहे विचारों पर नहीं। इसके लिए साँसों की गहराई को महसूस करें।

नोट : आंखें बंद रखना चाहिए। हाथ को शरीर से छह इंच की दूरी पर व पैरों में एक से डेढ़ फीट की दूरी रखें। शरीर को ढीला छोड़ देना चाहिए। श्वास की स्थिति में शरीर को हिलाना नहीं चाहिए।


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