दिल की नजर से, नजरों की दिल से ....
ये बात क्या है कोई हमें बता दें ....
वे एक ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ उन्हें स्वयं नहीं पता कि जो उन्हें हुआ है वह प्यार है भी या नहीं? प्यार की शुद्धता और सहजता से अनजान आज के प्रेमी इस सवाल से जूझ रहे हैं कि कोई तो आए और उन्हें यह बताए कि 'हाँ, यही प्यार है।'
आज प्यार की सरलता कायम नहीं रही। उसकी गहराई में अंतर आया है। अगर ऐसा नहीं होता तो क्यों टूटकर बिखरता वह किरचों-किरचों में? तो क्या जो टूटता है वह प्यार होता ही नहीं है? मनोविज्ञान कहता है प्यार तो मन में एक बार बसी छवि की ऐसी अनुभूति है जो शाश्वत होती है। समय के चिह्न भी फिर जिस पर दिखाई नहीं देते हैं। यहाँ तक कि दैहिक परिवर्तन भी नहीं। प्यार यदि सचमुच प्यार ही है तो समय बीतने के साथ उसका रंग गहराता ही है, धूमिल नहीं होता। लंबे समय तक साथ रहने के बाद एक-दूसरे को देखा नहीं जाता बल्कि अनुभूत किया जाता है, ह्रदय की अनंत गहराइयों में। जो लोग अपनी सच्ची अंतरंगता के साथ एक-दूसरे के साथ रहते हैं, वे एक-दूसरे में अंशत: समाहित हो जाते हैं।
सुन रहे हैं आज के प्रेम परिंदे?? नहीं, उन्हें यह सब 'इमोशनल फूल्स' लोगों का काम लगता है।
जबकि आज के प्रेम पँछियों का हिसाब साफ है - उसकी पसंद उसके साथ, मेरी मेरे साथ। अपनी पसंद थोप नहीं सकती वह मेरे ऊपर। उसकी बातें मान कर उसके मुगालते बढ़ाने हैं क्या? ज्यादा नाटक किए तो... कमी नहीं है शहर में लड़कियों की ....एक छोड़ों दस मिलती है। यहाँ से बात को कैसे आगे बढ़ाया जाए??
क्यों आज के प्यार में ना सुगंध है ना सौन्दर्य। ना कोमलता ना समर्पण के पराग-कण? िवख्यात कवि नरेश मेहता ने कहा था - प्रेम अब फूल नहीं फूल के चित्र जैसा हो गया है। अब आप ही बताएँ चित्र से सुगंध की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? |
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लेखक के बारे में
स्मृति आदित्य