Kanwar Yatra : कांवड़ में दिखी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की अमरगाथा, शिवभक्तों ने अनोखे अंदाज में दी श्रद्धांजलि
राष्ट्रीय राजमार्ग-58 इन दिनों आस्था के समुद्र में गोते लगा रहा है। शिवभक्त हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने-अपने गंतव्य की तरफ बढ़ रहे है। लाखों शिवभक्तों के बीच रंग-बिरंगी और आकर्षक कांवड़ें हर किसी का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच रही हैं। लेकिन ऐसे में जब शिव चौक से एक गुजरी कांवड़ ने लोगों के दिलों को गहराई तक छू लिया। यह केवल कांवड़ नहीं थी, बल्कि देश की आजादी के अमर सेनानियों को समर्पित एक चलती-फिरती श्रद्धांजलि थी।
इस अनोखी कांवड़ में चार शिवभक्तों की टोली ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह, अमर क्रांतिकारी सुखदेव और राजगुरु का स्वरूप धारण किया हुआ था। तीनों युवाओं के हाथों में हथकड़ियां थीं, जबकि चौथा शिवभक्त ब्रिटिश शासन के सिपाही की वेशभूषा में उन हथकड़ियों की रस्सी थामे उनके साथ चल रहा था। यह दृश्य जैसे ही लोगों की नजरों में आया, कदम ठहर गए और सड़क किनारे श्रद्धा, गर्व और उत्साह से भरी भीड़ जमा हो गई। हर कोई इस अनूठी प्रस्तुति को अपने कैमरे में कैद करने के साथ-साथ इन युवाओं की सोच की सराहना करता नजर आया।
कांवड़ यात्रा में शामिल इस टोली का उद्देश्य केवल गंगाजल लेकर शिवधाम पहुंचना नहीं, बल्कि देश के युवाओं को उन महान क्रांतिकारियों की याद दिलाना भी है, जिन्होंने हंसते-हंसते मातृभूमि की आजादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
टोली के सदस्य शुभम सिंह जो भगत सिंह की वेशभूषा में हैं, बताते हैं कि उनका उद्देश्य नई पीढ़ी के मन में देशभक्ति की भावना जगाना है। उन्होंने कहा, हम देश के वीर क्रांतिकारियों को श्रद्धांजलि देने निकले हैं। उन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया। आज कई युवाओं को यह भी नहीं पता कि भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु कौन थे। हम चाहते हैं कि उनके बलिदान की गाथा हर युवा जाने और उसके भीतर भी देश के प्रति वही समर्पण और सम्मान जागृत हो।
उन्होंने बताया कि उनकी टोली हरिद्वार से गंगाजल लेकर दिल्ली के न्यू अशोक नगर स्थित मंदिर तक पैदल यात्रा कर रही है। प्रतिदिन लगभग 25 से 30 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए वे अपनी मंजिल की तरफ बढ़ रही हैं। शुभम मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर के रहने वाले हैं, जबकि वर्तमान में दिल्ली में रह रहे हैं।
जब तीन नौजवानों ने हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूम लिया
23 मार्च 1931 का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। इसी दिन भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने लाहौर जेल में अंग्रेजी हुकूमत के फांसी के फंदे को मुस्कुराते हुए चूम लिया था। उनका अपराध केवल इतना था कि उन्होंने गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत को स्वतंत्र कराने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए अपने प्राणों का हंसते बलिदान दे दिया।
भगत सिंह का यह विश्वास था कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत उसके जागरूक और देशभक्त युवा होते हैं। सुखदेव और राजगुरु ने भी उसी संकल्प के साथ अपने प्राण मातृभूमि को अर्पित कर दिये । उनका बलिदान आज भी हर भारतीय के के राष्ट्रप्रेम की ज्वाला जला रहा है।
आस्था और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत संगम
कांवड़ यात्रा सदियों से भगवान शिव के प्रति श्रद्धा और समर्पण का प्रतीक रही है, लेकिन जब इसी यात्रा में राष्ट्रभक्ति का संदेश भी जुड़ जाए तो उसका स्वरूप और अधिक प्रेरणादायी बन जाता है। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के रूप में निकली यह शिवभक्तों की टोली आस्था के साथ-साथ देशप्रेम का संदेश भी जन-जन तक पहुंचा रही है।
मुजफ्फरनगर में इस अनूठी कांवड़ ने यह साबित कर दिया कि यदि युवा चाहें तो धार्मिक आयोजनों के माध्यम से भी समाज को सकारात्मक संदेश दे सकते है। यह कांवड़ केवल गंगाजल नहीं ला रही, बल्कि नई पीढ़ी यानी जेन Z के मन में देशभक्ति, बलिदान और राष्ट्र की भावना को जगाने का काम कर रही है। वास्तव में यह कांवड़ उन अमर शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि हैं, जिनकी बदौलत हमें आजादी मिली और हम सभी खुली हवा में सांस ले पा रहें हैं।

