अमीर बनने से पहले बूढ़ा हो जाएगा भारत! 2050 तक हर 5 में 1 भारतीय होगा 60 साल से ज्यादा उम्र का
भारत में वर्ष 2050 तक औसतन हर 5 में से एक व्यक्ति की आयु 60 वर्ष या उससे अधिक होगी। साथ ही लगभग 10 में से 7 बुजुर्ग ग्रामीण भारत में रहेंगे। ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया (टीआरआई) की रिचर्स के अनुसार भारत विकसित देशों के विपरीत समृद्ध बनने से पहले ही वृद्ध होती आबादी वाले देश की श्रेणी में पहुंच रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस), लॉन्गिट्यूडिनल एजिंग स्टडी इन इंडिया (एलएएसआई), जनगणना के अनुमान, टाइम यूज सर्वेक्षण तथा अन्य राष्ट्रीय आंकड़ों के आधार पर तैयार श्वेतपत्र में बताया गया है कि भारत की पारंपरिक पारिवारिक देखभाल व्यवस्था पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। रिचर्स के मुताबिक कई विकसित देशों ने समृद्धि हासिल करने के बाद वृद्ध होती आबादी की चुनौती का सामना किया, जबकि भारत में यह स्थिति उससे पहले ही बन रही है।
रिचर्स के अनुसार प्रत्येक बुजुर्ग को सहारा देने वाले कामकाजी आयु वर्ग के लोगों की संख्या 2001 में 8.4 थी, जो 2026 तक घटकर औसतन 5.2 रहने का अनुमान है। ग्रामीण भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव, बदलते पारिवारिक ढांचे और देखभाल व्यवस्था का भविष्य शीर्षक वाला यह श्वेतपत्र ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया की इंडिया रूरल कालक्वी (आईआरसी) के अवसर पर जारी किया गया। रिचर्स के अनुसार 2050 तक भारत में लगभग 34.7 करोड़ लोग यानी हर पांच में से एक व्यक्ति 60 वर्ष या उससे अधिक आयु का होगा। रिचर्स के अनुसार 10 में से करीब सात बुजुर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में रहेंगे।
श्वेतपत्र के मुताबिक भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था मुख्य रूप से प्रसव, टीकाकरण और गंभीर बीमारियों जैसी तत्काल स्वास्थ्य जरूरतों को पूरा करने के लिए विकसित की गई थी। रिचर्स के अनुसार कई विकसित देशों ने समृद्ध बनने के बाद वृद्ध होती आबादी की चुनौती का सामना किया जबकि भारत में यह जनसांख्यिकीय बदलाव अपेक्षाकृत कम आय स्तर पर ही हो रहा है।
क्या है कारण
रिसर्च के मुताबिक इसका कारण परिवारों का पहले की तुलना में छोटा होना, युवाओं का रोजगार के लिए घर से दूर जाना और लोगों की औसत आयु में वृद्धि होना है। इसके बावजूद देश में लगभग 94 प्रतिशत बुजुर्गों की देखभाल अब भी परिवारों के भीतर ही की जाती है, जिससे परिवार के कम सदस्यों पर बुजुर्गों की बढ़ती और पहले से अधिक जटिल देखभाल की जिम्मेदारी आ रही है। रिचर्स के अनुसार महिलाएं प्रतिदिन औसतन 305 मिनट बिना किसी वेतन के देखभाल कार्यों में बिताती हैं, जबकि पुरुषों का योगदान केवल 56 मिनट का है।
बिना किसी वेतन के कार्यों का यह असमान बंटवारा महिलाओं की श्रम बल भागीदारी बढ़ाने में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बना हुआ है। अध्ययन में यह भी बताया गया कि जलवायु परिवर्तन ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है, लू और बाढ़ जैसी घटनाओं के कारण महिलाओं के अवैतनिक काम का बोझ काफी बढ़ रहा है। श्वेतपत्र के अनुसार स्वास्थ्य सेवा के अगले चरण में लंबे समय से चली आ रही बीमारियों, दिव्यांगता और बढ़ती उम्र से जुड़ी चुनौतियों से जूझ रहे लोगों की सहायता करना शामिल है, जिसे केवल अस्पतालों के माध्यम से पूरा नहीं किया जा सकता।

