अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM) ने चिंता जताई है कि सूडान में हिंसक टकराव की वजह से विस्थापित होने वाले लगभग 40 लाख लोगों ने अपने घरों की ओर वापसी की है, लेकिन वहां भी उन्हें गुज़र-बसर के लिए एक नए संघर्ष से जूझना पड़ रहा है। यूएन प्रवासन एजेंसी के उप महानिदेशक सुंग आह ली ने कहा कि विस्थापितों की वापसी मोटे तौर पर राजधानी ख़ारतूम और पड़ोस में स्थित प्रान्त अल जज़ीराह तक सीमित है।
उन्होंने बताया कि वह सोमवार को ख़ारतूम में थीं और वहां उन्होंने बड़ी संख्या में लोगों को ऐसे इलाक़ों में लौटते हुए देखा, जहां घरों और जल, स्वास्थ्य, बिजली समेत अन्य बुनियादी सेवाओं को भीषण क्षति पहुंची है। उप महानिदेशक आह ली ने कहा कि कठोर वास्तविकताओं के बावजूद घर वापस लौटने का निर्णय, विस्थापितों के संकल्प को दर्शाता है और यह भी कि वे कठिन परिस्थितियों की वजह से वापसी के लिए मजबूर हो रहे हैं। यूएन एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2026 में ख़ारतूम में 20 लाख से अधिक अतिरिक्त लोगों के वापस लौटने का अनुमान है।
बहुत से लोग इसलिए लौट रहे हैं, चूंकि उनका मानना है कि सुरक्षा बेहतर हुई है, जबकि अन्य के लिए आर्थिक चुनौतियों व कठिन परिस्थितियों की वजह से विस्थापित के तौर पर जीवन असहनीय हो गया है। सूडान की सशस्त्र सेना और अर्द्धसैनिक बल के बीच 15 अप्रैल 2023 को हिंसक टकराव भड़क उठा था, जिससे अल जज़ीराह, ख़ारतूम, सेन्नार और कोर्दोफ़ान विशेष रूप से प्रभावित हुए।
क़रीब 1.2 करोड़ लोग सुरक्षित स्थानों पर शरण लेने के लिए विस्थापित होने के लिए मजबूर हुए और 45 लाख लोगों ने चाड, मिस्र और दक्षिण सूडान में शरण ली। 90 लाख लोग अब भी आन्तरिक विस्थापितों के तौर पर रह रहे हैं। IOM ने बताया है कि सूडान के गेदारेफ़, कस्साला समेत कई प्रान्तों ने विस्थापितों की मेज़बानी की है, इस बोझ को साझा किया है, जबकि वे पहले से ही स्वयं आर्थिक कठिनाइयों और जलवायु सम्बन्धी दबावों का सामना कर रहे हैं। इस स्थिति में उनके लिए उपलब्ध बुनियादी ढांचा दरकने के कगार पर पहुंच चुका है।
बचने की क्षीण सम्भावना
ख़ारतूम में विस्थापितों की वापसी होने से युद्ध में क्षतिग्रस्त हुए बुनियादी प्रतिष्ठानों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा है। वहीं कृषि उत्पादन के लिए अहम क्षेत्र अल जज़ीराह में विध्वंस का स्तर इतना विशाल है कि वहां लोगों के लिए कुछ उगा पाना एक बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
IOM उप महानिदेशक के अनुसार, लौटने वाले किसान अपने खेतों की स्थिति देख रहे हैं, जहां सिंचाई व्यवस्था व उपकरणों को भारी क्षति पहुंची है, जिससे देश के लिए एक कठिन स्थिति में आजीविका साधनों व खाद्य उत्पादन पर जोखिम है। अति आवश्यक सेवाओं को बहाल करने, बुनियादी प्रतिष्ठानों को फिर से खड़ा करने और आजीविकाओं को पुनर्जीवित करने के लिए यदि तत्काल निवेश नहीं किया गया तो सुरक्षित व सतत वापसी पर गम्भीर जोखिम होगा।
युद्धविराम उम्मीदों को झटका
सूडान में युद्धविराम हासिल करने के लिए कूटनीतिक प्रयास जारी हैं, मगर फ़िलहाल हिंसक टकराव पर विराम नहीं लग पाया है, जो कि विश्व में सबसे बड़ा विस्थापन व संरक्षण संकट बना है।
लड़ाई के दौरान गम्भीर हिंसा, आम नागरिकों के विरुद्ध व्यापक पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन मामलों को अंजाम दिया गया है, जिनमें यौन हिंसा, यातना, फ़िरौती, मनमाने ढंग से हत्याएं और विशिष्ट जातीय समूहों को जानबूझकर निशाना बनाए जाने समेत अन्य अपराध हैं। यूएन शरणार्थी एजेंसी (UNHCR) के अनुसार, जैसे-जैसे सूडान संकट अपने चौथे वर्ष में प्रवेश कर रहा है, इसका स्तर और जटिलता गहन होती जा रही है।
यूएन एजेंसी ने कहा है कि सूडान के भीतर और सीमा पार अन्य देशों में लोग अब भी असुरक्षा की वजह से शरण की तलाश में जा रहे हैं। स्वास्थ्य केन्द्र बन्द होने, पोषण कार्यक्रम स्थगित होने और संरक्षण सेवाओं में कटौती से उन्हें बार-बार विस्थापित होने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।