मनु स्मृति कितना पुराना ग्रंथ है, जानिए एक सचाई...

Last Updated: गुरुवार, 14 फ़रवरी 2019 (14:44 IST)
अग्निवायुरविभ्यस्तु त्र्यं ब्रह्म सनातनम। 
दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृगयु: समलक्षणम्।। मनु 1/13 
 
टिप्पणी : कुछ लोग बगैर किसी आधार के मानते हैं कि कोई दो हजार साल पहले ब्राह्मणों ने 'मनुस्मृति' की रचना उस वक्त की जब देश से ब्राह्मणों और ब्राह्मणवादी विचारों का वर्चस्व खत्म हो रहा था। ऐसे में ब्राह्मणों ने अपने वर्चस्व को पुन: स्थापित करने के लिए मनु स्मृति लिखी और इसमें ब्राह्मणों को देवतुल्य घोषित किया गया। लेकिन ऐसा मानने वाले इतिहास को गहराई से शायद ही जानते होंगे। यदि वे गुलामी के काल का अच्छे से अध्ययन कर लेते, तो संभवत: ऐसा नहीं मानते। लेकिन यह भी सच ही है कि दुनिया के कानून का नक्षा मनु स्मृति को आधार मानकर ही बनाया गया है।
 
यदि वेद कंठस्थ नहीं होते और वे विशेष छंदों में नहीं लिखे गए होते, तो उनका हाल भी मनु स्मृति की तरह होता। तब हिन्दू समाज को विभाजित करने के लिए एक और ग्रंथ मिल जाता। यहां पहली बात यह समझने की है कि मनु स्मृति को कभी भी हिन्दुओं ने अपना धर्मग्रंथ नहीं माना। इसका कभी भी किसी मंदिर में पाठ भी नहीं होता और न ही इसे कोई पढ़ता है। कोई इसे खरीदकर घर में भी नहीं रखता है। कुछ का मत है कि पहले एक 'मानव धर्मशास्त्र' था जो अब उपलब्ध नहीं है। अत: वर्तमान 'मनुस्मृति' को मनु के नाम से प्रचारित करके उसे प्रामाणिकता प्रदान की गई है। परंतु बहुमत इसे स्वीकार नहीं करता।
 
मनु स्मृति में हेरफेर :  ऐसी मान्यता अधिक है कि अंग्रेज काल में इस ग्रंथ में हेरफेर करके इसे जबरन मान्यता दी गई और इस आधार पर हिन्दुओं का कानून बनाया गया। जब अंग्रेज चले गए तो भारत में जो सरकार बैठी उसने यह कभी ध्यान नहीं दिया की अंग्रेजों द्वारा जो गड़बड़ियां की गई थी उसे ठीक किया जाए। उन्होंने भी अंग्रेजों का अनुसरण करते हुए अंग्रेजों की ही परंपरा को आगे बढ़ाया।
 
कुछ विद्वान मानते हैं कि मनुस्मृति में वेदसम्मत वाणी का खुलासा किया गया है। वेद को कोई अच्छे से समझता या समझाता है तो वह है मनुस्मृति। लेकिन फिर भी राजा मनु ने इसमें कुछ अपने विचार भी प्रक्षेपित किए हैं। अब मनु स्मृति की बात करें तो अब तक 14 मनु हो गए हैं। प्रत्येक मनु ने अलग मनु स्मृति की रचना की है। इसी तरह प्रयेक ऋषियों की अलग अलग स्मृतियां हैं और इस तरह कम से कम 20-25 स्मृतियां मौजूद हैं।
 
यह मनस्मृति पुस्तक महाभारत और रामायण से भी प्राचीन है। गीता प्रेस गोरखपुर या फिर गायत्री परिवार से प्रकाशित मनुस्मृति को ही पढ़ना चाहिए, क्योंकि अन्य प्रकशनों की मनुस्मृति पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि वह सही है या नहीं। ऐसे भी मनुस्मृति है जिसमें कुछ सूत्रों श्लोकों के साथ छेड़कानी करके उसे खूब प्रचारित और प्रसारित किया गया है।
 
मनुस्मृति के बहुत से संस्करण उपलब्ध हैं। कालान्तर में बहुत से प्रक्षेप भी स्वाभाविक हैं। साधारण व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं है कि वह बाद में सम्मिलित हुए सूत्रों या अंशों की पहचान कर सके। कोई अधिकारी विद्वान ही तुलनात्मक अध्ययन के उपरान्त ऐसा कर सकता है। क्योंकि बहुत ही चालाकी से यह जोड़े गए हैं। पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार मनु परंपरा की प्राचीनता होने पर भी वर्तमान मनुस्मृति ईसा पूर्व चतुर्थ शताब्दी से प्राचीन नहीं हो सकती।
 
मनुस्मृति के अनेक मत या वाक्य जो निरुक्त, महाभारत आदि प्राचीन ग्रंथों में नहीं मिलते हैं, उनके हेतु पर विचार करने पर भी कई उत्तर प्रतिभासित होते हैं। इस प्रकार के अनेक तथ्यों का बुहलर (Buhler, G.) (सैक्रेड बुक्स ऑव ईस्ट सीरीज, संख्या 25), पाण्डुरंग वामन काणे (हिस्ट्री ऑव धर्मशात्र में मनुप्रकरण) आदि विद्वानों ने पर्याप्त विवेचन किया है। यह अनुमान बहुत कुछ संगत प्रतीत होता है कि मनु के नाम से धर्मशास्त्रीय विषय परक वाक्य समाज में प्रचलित थे, जिनका निर्देश महाभारतादि में है तथा जिन वचनों का आश्रय लेकर वर्तमान मनुसंहिता बनाई गई, साथ ही प्रसिद्धि के लिये भृगु नामक प्राचीन ऋषि का नाम उसके साथ जोड़ दिया गया। मनु से पहले भी धर्मशास्त्रकार थे। 
अगले पन्ने पर जानिए यह रहस्य की आखिर मनु स्मृति किसने लिखी और यह कितनी प्राचीन है....



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