इतिहास के पन्नों को जब हम पलटते हैं, तो अक्सर कुछ गौरवशाली गाथाएं कहीं पीछे छूट जाती हैं। अगर इतिहास की किताबों में हरिषेण की 'प्रयाग प्रशस्ति' के आधार पर सम्राट समुद्रगुप्त के विजय अभियानों को पढ़ाया जाता है, तो समय आ गया है कि सोमदेव के 'कथासरित्सागर' और आचार्य क्षेमेंद्र की 'बृहत्कथामंजरी' के उन पन्नों को भी सामने लाया जाए, जो उज्जैन के महान सम्राट विक्रमादित्य के अखंड भारत साम्राज्य की गवाही देते हैं। आइए, इतिहास के इस नए और भव्य अंदाज़ में सम्राट विक्रमादित्य के उस चक्रवर्ती अभियान को समझते हैं, जिसने भारत की सीमाओं को ईरान तक फैला दिया था। इस महा-विजय यात्रा को चार मुख्य क्षेत्रों में श्रेणीबद्ध करके विस्तार से समझते हैं।
1. शकों का समूल नाश और भारत का पश्चिमी अभियान
सम्राट विक्रमादित्य की पहली और सबसे बड़ी चुनौती विदेशी आक्रांता 'शक' थे। उन्होंने शकों को देश से खदेड़ने के लिए एक सिलसिलेवार अभियान चलाया:-
चरण 1 (मालवा की मुक्ति): विक्रमादित्य ने सबसे पहले अपने गृह क्षेत्र मालवा पर कुंडली मारकर बैठे शकों पर भीषण आक्रमण किया और उन्हें वहां से भागने पर मजबूर कर दिया।
चरण 2 (गुजरात पर विजय): मालवा से हारकर शक जब गुजरात की ओर भागे, तो सम्राट ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। उन्होंने गुजरात पर हमला कर वहां भी अपना परचम लहराया।
चरण 3 (सिंधु और शकों का अंत): गुजरात से खदेड़े जाने के बाद शक सिंध जा छुपे। विक्रमादित्य ने एक निर्णायक सैन्य अभियान चलाकर उन्हें सिंध और भारत की सीमाओं से हमेशा-हमेशा के लिए बाहर खदेड़ दिया।
2. आर्यावर्त (उत्तर और मध्य भारत) का एकीकरण
शकों के सफाए के बाद, सम्राट ने उत्तर और मध्य भारत के जनपदों को एक सूत्र में पिरोने का काम शुरू किया:-
चरण 4 (मत्स्य देश): सम्राट ने मध्य भारत के मत्स्य देश (वर्तमान राजस्थान का क्षेत्र) पर आक्रमण कर उसे अपने साम्राज्य में मिलाया।
चरण 5 (कुरु जनपद): यहाँ से आगे बढ़ते हुए उन्होंने कुरु जनपद (आज का दिल्ली और हरियाणा क्षेत्र) पर विजय प्राप्त की।
चरण 6 और 7 (पांचाल, मथुरा और प्रयाग): इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश के पांचाल जनपद और कृष्ण की नगरी मथुरा को जीता। अपनी सेना के साथ आगे बढ़ते हुए उन्होंने प्रयाग (इलाहाबाद) तक अपने शासन का विस्तार किया।
चरण 8 (पूर्वदिक्ग): प्रयाग की विजय के बाद सम्राट ने संपूर्ण उत्तर प्रदेश (पूर्वदिक्ग) को अपने अधीन कर लिया।
3. पूर्वी भारत और सुदूर दक्षिण (समुद्र पार तक) की विजय
उत्तर भारत को सुदृढ़ करने के बाद विक्रमादित्य की सेनाएं पूर्व और फिर दक्षिण की ओर बढ़ीं, जहाँ उन्होंने समुद्र पार के द्वीपों तक को जीत लिया:
चरण 9, 10 और 11 (बिहार, बंगाल और बांग्लादेश): पूर्व की ओर बढ़ते हुए सम्राट ने अंग (बिहार), गौड़ (पश्चिम बंगाल) और फिर बंग (वर्तमान बांग्लादेश) पर अपनी संप्रभुता स्थापित की।
चरण 12 (कलिंग): इसके बाद उन्होंने ओडिशा के ऐतिहासिक कलिंग क्षेत्र को जीता।
चरण 13 और 14 (अपरांत और विदर्भ): दक्षिण का रुख करते हुए उन्होंने अपरांत (कोंकण क्षेत्र) और विदर्भ (महाराष्ट्र का नागपुर क्षेत्र) पर विजय पताका फहराई।
चरण 15 और 16 (आंध्र और कुंतल): विजय रथ आगे बढ़ा और आज के आंध्र प्रदेश-तेलंगाना (आंध्र) तथा कर्नाटक (कुंतल) को साम्राज्य का हिस्सा बनाया गया।
चरण 17 (केरल, तमिल और सिंहल द्वीप): मुख्य भूमि के सुदूर दक्षिण यानी केरल और तमिल क्षेत्रों को जीतने के बाद सम्राट की सेना ने समुद्र पार किया और सिंहल द्वीप (आज का श्रीलंका) को भी जीत लिया।
चरण 18 (हिंद महासागर के द्वीप): श्रीलंका विजय के बाद, उन्होंने हिंद महासागर में स्थित कई छोटे-बड़े रणनीतिक द्वीपों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया।
4. पश्चिमोत्तर सीमांत और अंतरराष्ट्रीय विजय (ईरान तक साम्राज्य)
भारत के भीतर और दक्षिण में अपनी धाक जमाने के बाद, सम्राट विक्रमादित्य ने उस दौर की वैश्विक शक्तियों और विदेशी मलेच्छों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया:
चरण 19 (कश्मीर और पश्चिमोत्तर): उन्होंने भारत के पश्चिमोत्तर क्षेत्र पर एक बड़ा हमला बोला, जिसमें कश्मीर, कावेरी और काष्ठा के क्षेत्रों को जीतकर वहां पैर पसारे बैठे विदेशियों को बाहर निकाला।
चरण 20 (पेशावर के मलेच्छ): कश्मीर से आगे बढ़ते हुए सम्राट ने पेशावर (वर्तमान पाकिस्तान) के क्षेत्र में 'मलेच्छों' को बुरी तरह पराजित कर खदेड़ा।
चरण 21 (यवनों की पराजय): पेशावर के भी पार जाकर उन्होंने यवनों (यूनानियों/ग्रीक्स) की सेनाओं को धूल चटाई।
चरण 22 (तुषारों/कुषाणों का अंत): विक्रमादित्य ने आगे बढ़कर तुषार साम्राज्य यानी कुषाणों को परास्त किया। इस विजय के साथ ही वे आधुनिक ईरान की सीमाओं तक जा पहुंचे।
चरण 23 (पार्थियन विजय - ईरान पर कब्जा): अपने अंतिम और सबसे भव्य चरण में, राजा विक्रमादित्य ने पार्थियन यानी 'पहलवों' को उनके ही घर में युद्ध हराकर संपूर्ण ईरान पर सनातन साम्राज्य का भगवा ध्वज लहरा दिया।
निष्कर्ष: सोमदेव और क्षेमेंद्र के ग्रंथ केवल कहानियों के पुलिंदे नहीं हैं, बल्कि वे भारत के उस स्वर्णिम काल के दस्तावेज हैं जब उज्जैन की धरती से उठकर एक महानायक ने भारत को 'अखंड भारत' बनाया था और उसकी सीमाएं एशिया के दिल (ईरान) तक फैला दी थीं। यह इतिहास की वह भव्य गाथा है, जो हर भारतीय को गौरवान्वित करती है। ऐतिहासिक साक्ष्यों के अलावा, उन्हें वेताल पंचविंशति (विक्रम और बेताल) और सिंहासन बत्तीसी जैसी लोककथाओं में एक ऐसे पराक्रमी चक्रवर्ती सम्राट के रूप में दिखाया गया है, जिन्होंने कभी कोई युद्ध नहीं हारा।
- संकलन: अनिरुद्ध जोशी