श्री गुरु ग्रंथ साहिब में फाग
- एसएस नारंग
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सिख पंथ के पाँचवें गुरु श्री गुरु अरजन देवजी ने 'होली' के पर्याय के रूप में प्रचलित 'फाग' शब्द का भी प्रयोग करके, प्रकारांतर से भक्त प्रह्लाद की प्रभु-भक्ति को ही ध्यान में रखकर 'होली' का सही स्वरूप संतों की सेवा तथा गुरु भक्ति में रंगे रहने को माना है, श्री गुरुग्रंथ में लिखा है-
आजु हमारै बने फाग ! प्रभ संगी मिली खेलन लाग ॥
होली कीनी संत सेव ! रंगु लागा अति लाल देव ॥2॥
मनु तनु मउलिओ अति अनूप ! सूकै नाही छाव धूप ॥
सगली रूती हरिआ होई ! सद बसंत गुर मिले देव ॥3॥
(श्री गुरु ग्रंथ साहिब का पन्ना 1180)

