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Last Updated : सोमवार, 9 फ़रवरी 2026 (16:06 IST)

शबरी की भक्ति से रामराज्य का मार्ग

भगवान राम और शबरी माता के जूठे बेर का सुंदर फोटो
श्री राम भगवान की अनन्य भक्त ​शबरी माता, जिनकी जयंती का पावन अवसर भारतीय संस्कृति में उस क्रांतिकारी क्षण की याद दिलाता है, जहां एक वनवासी महिला की श्रद्धा, सबूरी से आच्छादित पावन भक्ति ने ईश्वरीय सत्ता को सामाजिक वर्जनाओं के उल्लंघन के लिए विवश कर दिया था।ALSO READ: जानकी जयंती, माता सीता की पूजा का महत्व और कथा

रामायण का वह प्रसंग जिसमें प्रभु श्री राम ने माता शबरी के जूठे बेर खाए, वह केवल एक धार्मिक आख्यान नहीं बल्कि उस युग का सबसे बड़ा सामाजिक न्याय का प्रमाण था। किंतु आज जब हम आधुनिक भारत के मानचित्र पर जातिवाद की गहरी होती लकीरों को देखते हैं, तो हृदय में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या हम वास्तव में उसी राम के वंशज हैं जिन्होंने सामाजिक समरसता को अपने आचरण से सिद्ध किया था? 
 
क्या वर्तमान भारत में जातिवाद एक ऐसी अमरबेल नहीं बन चुकी है, जो विकास के वृक्ष को जकड़े हुए है। आज राजनीति से लेकर न्यायपालिका तक और आम गलियों से लेकर संसद तक, जाति की पहचान व्यक्ति की योग्यता और उसकी मानवीयता पर भारी पड़ रही है।
 
​वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में जातिवाद की समस्या और भी विकराल हो गई है। एक ओर सरकारें सबका साथ, सबका विकास के नारे के साथ जातिगत भेदभाव को मिटाने का दावा करती हैं, तो दूसरी ओर विपक्ष जातिगत जनगणना को सामाजिक न्याय की अंतिम कुंजी के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। राजनीति ने जाति को एक सशक्त चुनावी हथियार बना दिया है। 
 
चुनाव के समय प्रत्याशियों का चयन योग्यता या समाज सेवा के आधार पर नहीं, बल्कि उस निर्वाचन क्षेत्र के जटिल जातीय समीकरणों के आधार पर होता है। यह एक कड़वी सच्चाई है कि देश में विचारधाराओं की लड़ाई अब जातियों के ध्रुवीकरण में परिवर्तित हो गई है।

जब तक राजनीतिक दल जातियों को केवल वोट बैंक के चश्मे से देखेंगे, तब तक जातिवाद का अंत असंभव है। रामराज्य की कल्पना केवल भव्य निर्माणों से पूरी नहीं हो सकती, इसके लिए राम के उस चरित्र को और उनके दिखाए समरसता के मार्ग को सबको धारण करना होगा। प्रभु राम ने जातिगत श्रेष्ठता के अहंकार को शबरी के चरणों में समर्पित कर दिया था।
 
भारत में ​न्यायपालिका ने भी समय-समय पर जातिवाद के बढ़ते खतरों पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल के वर्षों में कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं, जिसमें कहा गया कि आजादी के सात दशकों बाद भी जातिवाद समाप्त होने के बजाय और अधिक गहरी जड़ें जमा चुका है। न्यायालय ने स्पष्ट रूप से सचेत किया है कि जातिवाद राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए सबसे बड़ा आंतरिक खतरा है। 
 
यह एक ऐसा सामाजिक कलंक है जिसे मिटाने के लिए समाज को केवल कानूनी प्रावधानों से आगे बढ़कर अपनी चेतना में बदलाव लाना होगा। वास्तविकता यह है कि कानून केवल दंडात्मक कार्रवाई कर सकता है, वह अंतरात्मा की शुद्धि नहीं कर सकता। आज भी देश के कई हिस्सों में दलितों की बारात पर पथराव होना या हाथरस और खैरलांजी जैसी जघन्य घटनाओं का घटित होना यह दर्शाता है कि हमारा आधुनिक समाज तकनीकी रूप से तो आगे बढ़ गया है, लेकिन वैचारिक रूप से वह आज भी मध्यकालीन संकीर्णता में फंसा हुआ है।
 
​इस विमर्श का एक दूसरा और अधिक चुनौतीपूर्ण पहलू लाभ पक्ष का मोह है। यह ऐतिहासिक सत्य है कि सदियों से वंचित रहे वर्गों (एसटी-एससी) को मुख्यधारा में लाने के लिए संवैधानिक आरक्षण की व्यवस्था की गई थी। किंतु आज यह व्यवस्था भी अनजाने में जातिगत पहचान को दृढ़ करने का एक शक्तिशाली माध्यम बन गई है। जब किसी व्यक्ति की प्रगति, शिक्षा और आर्थिक लाभ का एकमात्र आधार उसकी जाति बन जाती है, तो वह चाहकर भी उस पहचान से मुक्त नहीं होना चाहता। 
 
आज आरक्षित वर्गों के भीतर भी एक ऐसा प्रभावशाली उच्च वर्ग (क्रीमी लेयर) विकसित हो गया है जो आरक्षण के लाभ को पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने पास रखना चाहता है, भले ही वह सामाजिक और आर्थिक रूप से पूर्णतः सक्षम हो चुका हो। जब पीड़ित पक्ष भी जातिवाद को केवल अपने लाभ पक्ष की दृष्टि से देखने लगता है, तो वह भेदभाव की इस व्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से खाद-पानी देने लगता है। रामराज्य की प्राप्ति के लिए यह अनिवार्य है कि हम स्वार्थ से ऊपर उठकर सर्वहित की भावना विकसित करें।
 
​आज के दौर में समरसता का अर्थ केवल कागजी सह-अस्तित्व नहीं, बल्कि वास्तविक आत्मिक जुड़ाव होना चाहिए। हम देख रहे हैं कि उच्च शिक्षा और वैश्विक तकनीकी प्रगति के बावजूद, व्यक्तिगत जीवन में जातिगत प्राथमिकताएं आज भी स्पष्ट झलकती हैं। शिक्षित युवा भी आज सोशल मीडिया पर अपनी जाति के गौरव का प्रदर्शन जिस आक्रामकता के साथ करते हैं, वह चिंताजनक है। 
 
यह इस बात का संकेत है कि जातिवाद अब केवल अशिक्षा या ग्रामीण परिवेश की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह एक पहचान का संकट बन चुका है। राम जी ने वंचित वर्ग को गले लगाया और माता शबरी के जूठे फल खाकर जिस समरसता का बीज बोया था हमने उसे स्वार्थ और राजनीतिक महत्वाकांक्षा की खाद देकर सुखा दिया है। राम जी का चरित्र हमें सिखाता है कि जो समाज अपने सबसे कमजोर व्यक्ति को सम्मान नहीं दे सकता, वह कभी राज्य से रामराज्य नहीं बन सकता।
 
​रामराज्य का मार्ग उसी शबरी की कुटिया से होकर गुजरता है जहां ऊंच-नीच और भेदभाव का कोई स्थान नहीं था। यदि हम वास्तव में एक विकसित और समृद्ध भारत का सपना देखते हैं, तो हमें जातिगत जनगणना जैसे विभाजनकारी विमर्शों से ऊपर उठकर मानवीय मूल्यों की गणना की ओर बढ़ना होगा। समाज के हर वर्ग, विशेषकर युवाओं को यह समझना होगा कि जाति केवल एक पारिवारिक पहचान हो सकती है, लेकिन यह किसी के प्रति घृणा या श्रेष्ठता का आधार नहीं होनी चाहिए। 
 
शबरी जयंती पर हमारा वास्तविक संकल्प यह होना चाहिए कि हम राजनीति के बिछाए गए जातिगत बिसातों को उखाड़ फेंकें और एक ऐसे समाज का निर्माण करें जहां व्यक्ति का मूल्यांकन उसके गोत्र से नहीं बल्कि उसके गुण और कर्म से हो। जब तक हम जाति को सत्ता प्राप्ति और व्यक्तिगत लाभ का माध्यम बनाते रहेंगे, तब तक रामराज्य केवल एक सुदूर कल्पना ही बना रहेगा। वास्तविक समरसता तभी आएगी जब हम दूसरों की जाति पूछने से पहले अपनी इंसानियत को पहचानेंगे।
 
​जातिवाद का अंत न तो केवल सरकारी कानूनों से होगा और न ही राजनीतिक जनगणना से। यह केवल हृदय परिवर्तन और राम के समावेशी चरित्र को अपनाने से संभव है। यह शबरी जयंती पर दृढ़ संकल्पित हो कि प्रेम और श्रद्धा के समक्ष हर सामाजिक दीवार बोनी बनाएंगे। यदि हम वास्तव में रामराज्य के आकांक्षी हैं, तो हमें जाति के लाभ का मोह छोड़कर सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा को प्राथमिकता देनी होगी। समरसता तभी सार्थक होगी जब समाज का हर व्यक्ति दूसरे की जाति पूछने से पहले उसकी मानवीय गरिमा को पहचाना जाएगा।ALSO READ: Janaki Jayanti 2026: जानकी जयंती 2026: सीताष्टमी पर जानें पूजा का शुभ मुहूर्त, विधि और व्रत का महत्व

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)

Edited BY: Raajshri Kasliwal
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