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मोक्ष का रहस्य क्या है? श्रीराम ने हनुमानजी को बताया मांडूक्य उपनिषद का सार

Updated: शनिवार, 11 जुलाई 2026 (12:59 IST)
Mandukya Upanishad: समस्त वेदों का दिव्य सार उपनिषदों में निहित है, और उन उपनिषदों का भी परम निचोड़ मात्र 'मांडूक्य उपनिषद' है। यदि आप वेद, पुराण, महाभारत या भगवद्गीता जैसे वृहद ग्रंथों का अध्ययन नहीं भी कर पाते हैं, तो केवल मांडूक्य उपनिषद को पढ़ और समझ लेना पर्याप्त होगा। इसे जानने के बाद आप भली-भांति समझ जाएंगे कि सनातन धर्म के गूढ़ ज्ञान का मूल मर्म क्या है, इसका प्राकट्य क्यों हुआ और यह मानव जीवन की सार्थकता के लिए हमसे क्या चाहता है।
 

भगवान श्रीराम ने हनुमानजी को बताया मोक्ष का रहस्य

मांडूक्य उपनिषद सनातन धर्म के सबसे छोटे, लेकिन सबसे शक्तिशाली और गंभीर उपनिषदों में से एक है। यह अथर्ववेद के अंतर्गत आता है। आकार में यह बेहद संक्षिप्त है- इसमें केवल 12 मंत्र हैं, लेकिन इसका आध्यात्मिक महत्व इतना विशाल है कि 'मुक्तिका उपनिषद' में भगवान श्री राम ने हनुमान जी से कहा था:-
 
"माण्डूक्यमेकमेवाळमुमुक्षूणां विमुक्तये"
अर्थात: मोक्ष की इच्छा रखने वाले के लिए केवल मांडूक्य उपनिषद का ज्ञान ही काफी है।
इस उपनिषद का मुख्य उद्देश्य 'ॐ' (ओम्) अक्षर की व्याख्या करना और इसके माध्यम से आत्मा (चेतना) के स्वरूप को समझाना है। इसमें बताया गया है कि यह संपूर्ण ब्रह्मांड और कुछ नहीं, बल्कि 'ॐ' का ही विस्तार है।
 

चेतना की चार अवस्थाएं (Four States of Consciousness)

मांडूक्य उपनिषद में मानव चेतना और आत्मा को समझने के लिए उसे चार चरणों या अवस्थाओं में विभाजित किया गया है। इन्हें 'ॐ' की मात्राओं से जोड़ा गया है:
 

1. जाग्रत अवस्था (वैश्वानर) – 'अ' (A):

यह हमारी जागृत अवस्था है, जिसमें हम बाहरी दुनिया का अनुभव अपनी इंद्रियों (आंख, कान, नाक आदि) के माध्यम से करते हैं। इस अवस्था में जीव भौतिक जगत के सुख-दुख भोगता है। इसे 'ॐ' की पहली मात्रा 'अ' से दर्शाया गया है।
 

2. स्वप्न अवस्था (तैजस) – 'उ' (U):

यह सोते समय सपने देखने की अवस्था है। इसमें बाहरी इंद्रियां शांत हो जाती हैं, लेकिन मन सक्रिय रहता है। व्यक्ति अपने भीतर ही इच्छाओं और संस्कारों के आधार पर एक काल्पनिक संसार रचता है और उसका अनुभव करता है। इसे 'ॐ' की दूसरी मात्रा 'उ' से दर्शाया गया है।
 

3. सुषुप्ति अवस्था (प्राज्ञ) – 'म्' (M):

यह गहरी और शांतिपूर्ण नींद (Dreamless Sleep) की अवस्था है, जहाँ न तो कोई इच्छा होती है और न ही कोई सपना। यहाँ मन और बुद्धि सब शांत होकर अपने कारण रूप में लीन हो जाते हैं। यहाँ केवल असीम शांति और आनंद का अनुभव होता है, हालांकि अज्ञान की परत बनी रहती है। इसे 'ॐ' की तीसरी मात्रा 'म्' से दर्शाया गया है।
 

4. तुरीय अवस्था (शुद्ध चेतना) – अमात्र (Silent/Beyond):

 

मांडूक्य उपनिषद का सार

यह उपनिषद हमें सिखाता है कि हम केवल यह नश्वर शरीर या चंचल मन नहीं हैं। हम वह 'तुरीय' चेतना हैं जो जागते, सपने देखते और गहरी नींद में सोते समय भी हमेशा एक जैसी (साक्षी भाव में) बनी रहती है।
 
जब एक साधक 'ॐ' के 'अ', 'उ', और 'म्' का उच्चारण करते हुए अंत में उसके बाद आने वाले मौन (तुरीय) में विलीन हो जाता है, तो वह आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है और जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। अद्वैत वेदांत के महान संत आदि शंकराचार्य जी के गुरु के गुरु (परमगुरु) गौड़पादाचार्य ने इस उपनिषद पर प्रसिद्ध 'मांडूक्य कारिका' लिखी थी, जो अद्वैत दर्शन का स्तंभ मानी जाती है। ओशो रजनीश ने इस उपनिषद के ज्ञान को विस्तार से समझाया है।

लेखक के बारे में
अनिरुद्ध जोशी
पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों से साहित्य, धर्म, योग, ज्योतिष, करंट अफेयर्स और अन्य विषयों पर लिख रहे हैं। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सह-संपादक के पद पर कार्यरत हैं। दर्शनशास्त्र एवं ज्योतिष: मास्टर डिग्री (Gold Medalist), पत्रकारिता: डिप्लोमा। योग, धर्म और ज्योतिष में विशेषज्ञता।.... और पढ़ें

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