कैसा है गणेशजी का रंग, जानिए

Ganesha Worship
गणपति आदिदेव हैं जिन्होंने हर युग में अलग अवतार लिया। गणेशजी सतयुग में सिंह, त्रेता में मयूर, द्वापर में मूषक और कलिकाल में घोड़े पर सवार बताए जाते हैं। कहते हैं कि द्वापर युग में वे ऋषि पराशर के यहां गजमुख नाम से जन्मे थे। उनका वाहन मूषक था, जो कि अपने पूर्व जन्म में एक गंधर्व था। इस गंधर्व ने सौभरि ऋषि की पत्नी पर कुदृष्टि डाली थी जिसके चलते इसको मूषक योनि में रहने का श्राप मिला था। इस मूषक का नाम डिंक है। उनके 12 प्रमुख नाम हैं- सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र और गजानन। उनके प्रत्येक नाम के पीछे एक कथा है और प्रत्येक अवतार का रंग अलग अलग है।

1. : गणेशजी के प्रत्येक अवतार का रंग अलग अलग है परंतु शिवपुराण के अनुसार गणेशजी के शरीर का मुख्य रंग लाल तथा हरा है। इसमें लाल रंग शक्ति और हरा रंग समृद्ध‍ि का प्रतीक माना जाता है। इसका आशय है कि जहां गणेशजी हैं, वहां शक्ति और समृद्ध‍ि दोनों का वास है।
2. सभी देवताओं की शक्तियां : गणेशजी को सभी देवताओं की शक्तियां प्राप्त हैं। जिस तरह हनुमानजी को सभी देवताओं ने अपनी अपनी शक्तियां दी थीं उसी तरह गणेशजी को भी सभी देवताओं की शक्तियां प्राप्त हैं। इसके बावजूद उनके पास अपनी खुद की शक्तियां भी हैं।

3. गणेशजी प्रथम पूज्य देवता : सभी धर्मों में गणेश की किसी न किसी रूप में पूजा या उनका आह्वान किया ही जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गणेशजी को केतु के रूप में जाना जाता है। गणेश पूजा से बुध और केतु ग्रह का बुरा असर नहीं होता। प्रत्येक शुभ और मांगलिक कार्य में लाभ और शांति हेतु सबसे पहले गणेश स्तुति और पूजा ही की जाती है। ऐसा करने से किसी भी प्रकार के विघ्‍न नहीं आते हैं। शिवमहापुराण के अनुसार जब भगवान शिव त्रिपुर का नाश करने जा रहे थे, तब आकाशवाणी हुई कि जब तक आप श्री गणेश का पूजन नहीं करेंगे, तब तक तीनों पुरों का संहार नहीं कर पाएंगे। तब भगवान शिव ने भद्रकाली को बुलाकर का पूजन किया और युद्ध में विजय प्राप्त की।



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