प्राणायाम का रहस्य
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शरीर में दूषित वायु के होने की स्थिति में भी उम्र क्षीण होती है और रोगों की उत्पत्ति होती है। पेट में पड़ा भोजन दूषित हो जाता है, जल भी दूषित हो जाता है तो फिर वायु क्यों नहीं। यदि आप लगातार दूषित वायु ही ग्रहण कर रहे हैं तो समझो कि समय से पहले ही रोग और मौत के निकट जा रहे हैं।
बाल्यावस्था से ही व्यक्ति असावधानीपूर्ण और अराजक श्वास लेने और छोड़ने की आदत के कारण ही अनेक मनोभावों से ग्रसित हो जाता है। जब श्वास चंचल और अराजक होगी तो चित्त के भी अराजक होने से आयु का भी क्षय शीघ्रता से होता रहता है।
हठयोगियों ने विचार किया कि यदि सावधानी से धीरे-धीरे श्वास लेने व छोड़ने और बाद में रोकने का भी अभ्यास बनाया जाए तो परिणामस्वरूप चित्त में स्थिरता आएगी। श्वसन-क्रिया जितनी गहरी, लंबी, मंद और सूक्ष्म होगी उतना ही लंबा और मंद जीवन क्रिया के क्षय होने का क्रम होगा।
इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना ये तीन नाड़ियां प्रमुख हैं। प्राणायम के लगातार अभ्यास से ये नाड़ियां शुद्ध होकर जब सक्रिय होती हैं तो व्यक्ति के शरीर में किसी भी प्रकार का रोग नहीं होता और आयु प्रबल हो जाती है। मन में किसी भी प्रकार की चंचलता नहीं रहने से स्थिर मन शक्तिशाली होकर धारणा सिद्ध हो जाती है अर्थात ऐसे व्यक्ति की सोच फलित हो जाती है। यदि लगातार इसका अभ्यास बढ़ता रहा तो व्यक्ति सिद्ध हो जाता है।
-अनिरुद्ध

