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शरीर के डॉक्टर को पहचान लिया और साध लिया तो जिओगे 150 वर्ष

सोमवार,मई 6, 2019
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हर कोई चाहता है कि जब तक वह जीवित रहे, स्वस्थ ही रहे। स्वस्थ रहते हुए ही अपने बच्चों को बड़ा होते देखे व अपने नाती-पोतों को भी खिला ले। स्वस्थ शरीर में रहते हुए लंबी उम्र जीना हर किसी की इच्छा होती है। योग से आप तन-मन से स्वस्थ रहने के साथ ही अपनी ...
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हमारा शरीर ब्रह्मांड की एक ईकाई है। जैसा ऊपर, वैसा नीचे। जैसा बाहर, वैसा भीतर। संपूर्ण ब्रह्मांड को समझने के बजाय यदि आप खुद के शरीर की संवरचना को समझ लेंगे तो ब्राह्मांड और उसके संचालित होने की प्रक्रिया को भी समझ जाएंगे। यहां प्रस्तुत है शरीर में ...
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'डिप्रेशन' का कारण वातावरण, परिस्थिति, स्वास्थ्य, सामर्थ्य, संबंध या किसी घटनाक्रम से जुड़ा हो सकता है। आत्मीयता से उसे 'प्राणायाम' के लिए राजी करें।
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यूं तो प्राणायाम अनेक प्रकार के हैं, किन्तु यहां हम उन्हीं प्राणायाम की चर्चा करेंगे, जिन्हें गृहस्थी, बाल, युवा, वृद्ध, पुरुष एवं महिलाएं सुविधापूर्वक करके लाभ प्राप्त कर सकें। प्राणायाम करने वाले को कुछ सावधानियों के साथ नियमों का पालन करना आवश्यक ...
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शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से 3-3 दिन के अंतर से सूर्योदय के समय पहले बाईं नासिका से और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से 3-3 दिन के अंतर से सूर्योदय के समय पहले दाहिनी नासिका से नि:श्वास प्रवाहित होने का स्वाभाविक नियम है, परंतु-
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विश्वपिता विधाता ने मनुष्य के जन्म के समय में ही देह के साथ एक ऐसा आश्चर्यजनक कौशलपूर्ण अपूर्व उपाय रच दिया है जिसे जान लेने पर सांसारिक, वैषयिक किसी भी कार्य में असफलता का दु:ख नहीं हो सकता। हम इस अपूर्व कौशल को नहीं जानते, इसी कारण हमारा कार्य ...
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'डिप्रेशन' यानी नैराश्य, यानी मन और मानस का असहयोग, यानी प्रकृति से तादात्म्य न हो पाना या जीवन से आस्था उठ जाना। डिप्रेशन यानी जीने का नकारात्मक रवैया, स्वयं से अनुकूलन में असमर्थता आदि। जब ऐसा हो जाए तो उस व्यक्ति विशेष के लिए सुख, शांति, सफलता, ...
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बहुत छोटी-सी बात है, लेकिन समझने में उम्र बीत जाती है। हमारे रोगी और निरोगी रहने का राज छिपा है हमारी श्वासों में। व्यक्ति उचित रीति से श्वास लेना भूल गया है। हम जिस तरीके और वातावरण में श्वास लेते हैं उसे हमारी इड़ा और पिंगला नाड़ी ही पूर्ण रूप से ...
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योग के 8 अंगों में प्राणायाम का स्थान चौथे नंबर पर आता है। प्राणायाम को आयुर्वेद में मन, मस्तिष्क और शरीर की औषधि माना गया है। चरक ने वायु को मन का नियंता एवं प्रणेता माना है। आयुर्वेद अनुसार काया में उत्पन्न होने वाली वायु है उसके आयाम अर्थात निरोध ...
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'प्राण' का अर्थ योग अनुसार उस वायु से है जो हमारे शरीर को जीवित रखती है। शरीरांतर्गत इस वायु को ही कुछ लोग प्राण कहने से जीवात्मा मानते हैं। इस वायु का मुख्‍य स्थान हृदय में है।
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योग के आठ अंगों में से चौथा अंग है प्राणायाम। प्राण+आयाम से प्राणायाम शब्द बनता है। प्राण का अर्थ जीवात्मा माना जाता है, लेकिन इसका संबंध शरीरांतर्गत वायु से है जिसका मुख्य स्थान हृदय में है। व्यक्ति जब जन्म लेता है तो गहरी श्वास लेता है और जब मरता ...
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जब हम सांस लेते हैं तो वायु प्रत्यक्ष रूप से हमें तीन-चार स्थानों पर महसूस होती है। कंठ, हृदय, फेंफड़े और पेट। कान और आंख में गई वायु का कम ही पता चलता है लेकिन मस्तिष्क में गई हुई वायु का हमें पता नहीं चलता। मस्तिष्क में वायु को महसूस करेंगे तो ...
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लम्बी उम्र और यौवन का राज

गुरुवार,फ़रवरी 14, 2013
श्वास-प्रश्वास की उचित विधि मनुष्य को न केवल स्वस्थ, सुंदर और दीर्घजीवी बनाती है बल्कि ईश्वरानुभूति तक करा सकती है। सदा युवा बने रहने और जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए सांसों पर संयम जरूरी है। श्वास की गति का संबंध मन से जुड़ा है।
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मूर्छा का अर्थ होता है बेहोशी। इस कुम्भक के अभ्यास से वायु मूर्छित होती है, लेकिन व्यक्ति नहीं। परिणामतः मन भी मूर्छित होता है, इसी कारण इसे मूर्छा कुम्भक प्राणायाम (murcha pranayama) कहा जाता है। मूर्छा प्राणायाम का अभ्यास अधिक कठिन है।
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योगा रेचक क्रिया बहुत महत्वपूर्ण है। वैसे तो हम हर पल पूरक और रेचक क्रिया करते ही रहते हैं। पूरक का अर्थ है श्वास लेना और रेचक का अर्थ है श्वास छोड़ना। हम जन्म से लेकर मृत्यु तक पूरक और रेचक क्रिया करते रहते हैं।
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योग के आठ अंगों में से चौथा अंग है प्राणायाम। प्राणायाम करते या श्वास लेते समय हम तीन क्रियाएँ करते हैं- 1.पूरक 2.कुम्भक 3.रेचक। इसे ही हठयोगी अभ्यांतर वृत्ति, स्तम्भ वृत्ति और बाह्य वृत्ति कहते हैं। अर्थात श्वास को लेना, रोकना और छोड़ना। अंतर रोकने ...
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कछुए की श्वास लेने और छोड़ने की गति इनसानों से कहीं अधिक दीर्घ है। व्हेल मछली की उम्र का राज भी यही है। बड़ और पीपल के वृक्ष की आयु का राज भी यही है। वायु को योग में प्राण कहते हैं। प्राचीन ऋषि वायु के इस रहस्य को समझते थे तभी तो वे कुंभक लगाकर ...
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अग्निसार प्राणायाम क्रिया योग से शरीर के अंदर अग्नि उत्पन होने के कारण अंदर के रोगाणु नष्ट हो जाते हैं। इस प्लाविनी क्रिया भी कहते हैं।
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केवली कुम्भक प्राणायाम को साधना नहीं पड़ता, लेकिन साधना जरूरी भी है। तैराक लोग इसे अनंजाने में ही साध लेते हैं फिर भी वे इसे विधिवत करके साधें तो तैरने की गति और स्टेमिना और बढ़ सकता है।
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