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पंढरपुर यात्रा 2026: कब से कब तक चलेगी, क्यों निकाली जाती है? जानें 800 साल पुरानी इस यात्रा का पूरा सफर
Ashadhi Ekadashi Pandharpur Yatra: महाराष्ट्र की धरती जब 'जय जय राम कृष्ण हरि' और 'माउली-तुकाराम' के जयघोष से गुंजायमान होने लगती है, तो समझ लीजिए कि 'वारकरी संप्रदाय का कुंभ' यानी पंढरपुर वारी शुरू हो चुकी है। यह महज एक पैदल यात्रा नहीं, बल्कि भगवान विठोबा (श्री कृष्ण के स्वरूप) के प्रति अटूट प्रेम, समानता और असीम श्रद्धा का ऐसा समंदर है, जिसमें हर साल लाखों भक्त गोता लगाते हैं। आइए, इस अनूठी आध्यात्मिक यात्रा के इतिहास, महत्व और इस साल के सफर को एक नए अंदाज में समझते हैं।
कब से कब तक: वर्ष 2026 का भक्ति मार्ग
यह एक बेहद अनुशासित 21 दिवसीय पैदल यात्रा होती है, जो महाराष्ट्र के अलग-अलग कोनों से शुरू होकर आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी (आषाढ़ी एकादशी) के दिन पंढरपुर पहुंचकर संपन्न होती है। साल 2026 में इस महायात्रा का पूरा शेड्यूल कुछ इस तरह है:
7 जुलाई (देहू से प्रस्थान): भक्ति के सफर की शुरुआत हुई, जब संत तुकाराम महाराज की पावन पालकी ने देहू से पंढरपुर के लिए कदम बढ़ाए।
8 जुलाई (आलंदी से प्रस्थान): ज्ञान और भक्ति के संगम के साथ संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालकी ने आलंदी से अपनी यात्रा शुरू की।
23 जुलाई (वाखरी मिलन): अलग-अलग रास्तों से आ रही दोनों मुख्य पालकियां वाखरी नामक स्थान पर पहुंचकर एक-दूसरे से मिलेंगी।
24 जुलाई (पंढरपुर आगमन): लाखों वारकरियों का यह हुजूम भगवान विठोबा की नगरी पंढरपुर की सीमा में प्रवेश करेगा।
25 जुलाई (आषाढ़ी एकादशी महा-संगम): आषाढ़ी एकादशी के पावन मौके पर चंद्रभागा नदी के तट पर विट्ठल दर्शन के साथ इस 21 दिनों की कठिन और आनंदमयी पैदल यात्रा का समापन होगा।
क्यों निकाली जाती है यह वारी?
पंढरपुर वारी का मूल मंत्र है- 'भक्ति, समानता और सामाजिक समरसता'।
वारकरी संप्रदाय में मान्यता है कि इस पैदल यात्रा को करने से मनुष्य को मोक्ष और भगवान विठोबा का साक्षात आशीर्वाद मिलता है। इस यात्रा की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहाँ कोई अमीर नहीं, कोई गरीब नहीं, न कोई जाति भेद है और न ही कोई सामाजिक ऊंच-नीच। कंधे पर भगवा ध्वज, गले में तुलसी की माला और हाथों में मंजीरे लिए लाखों लोग जब एक साथ कदम बढ़ाते हैं, तो यह नजारा जीवंत 'भक्ति आंदोलन' का सबसे बड़ा उदाहरण बन जाता है। भक्त अपने प्रिय संतों के पदचिह्नों पर चलते हुए उनके 'अभंग' (भक्ति गीत) गाते हैं, जो हर थकान को पल भर में दूर कर देता है।
वारी का गौरवशाली इतिहास: 800 बरसों की अटूट परंपरा
पंढरपुर वारी का इतिहास 800 साल से भी अधिक पुराना और समृद्ध है।
इस महान परंपरा की नींव 13वीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर महाराज ने रखी थी, जिन्होंने सबसे पहले आलंदी से पंढरपुर तक की पैदल यात्रा शुरू की थी। आगे चलकर इस भक्ति मार्ग को और सुदृढ़ किया संत तुकाराम महाराज ने, जिन्होंने देहू से अपनी पालकी यात्रा की शुरुआत की।
इन संत-कवियों ने अपनी सरल और हृदयस्पर्शी कविताओं (अभंगों) के जरिए भगवान के प्रति प्रेम को महलों से निकालकर आम जनता के दिलों तक पहुंचाया। समय बदलता गया, लेकिन यह परंपरा रुकी नहीं। आज यह यात्रा महाराष्ट्र की संस्कृति, लोक-कला और सामाजिक ताने-बाने की धड़कन बन चुकी है, जो हर साल लाखों इंसानों को जात-पात से ऊपर उठाकर केवल एक 'भक्त' के धागे में पिरो देती है।
