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Chaturmas siddhi:चातुर्मास 2026: सिद्धि की कामना है तो इन 4 कार्यों को न भूलें
हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी यानी 'देवशयनी एकादशी' से चातुर्मास का प्रारंभ होता है जो देव उठनी एकादशी तक रहता है। यह चार महीने में साधु और संतजन एक ही जगह पर रुककर साधना और प्रवचन का कार्य करते हैं। यह समय साधना के द्वारा सिद्धि प्रात करने का सबसे उचित समय माना गया है। चलिए जानते हैं कि ऐसे कौन से 4 कार्य हैं जिन्हें करने से इन 4 माह में आप सिद्धियां प्राप्त कर सकते हैं।
सिद्धियां:
साधना और सिद्धियां कई प्रकार की होती है। परा और अपरा के साथ ही तंत्र साधान और सिद्धि भी होती है।
महाविद्या और अन्य साधनाएं: तंत्र और अघोर विधाओं में दस महाविद्या, भैरव, वाराही, चौसठ योगिनी, यक्ष-यक्षिणी, अप्सरा या गंधर्व आदि की साधनाएं की जाती हैं। इनके अलावा वीर, नाग, देव, नायिका, किन्नर और पिशाचिनी साधनाएं भी होती हैं (इन्हें केवल गुरु के मार्गदर्शन में ही करना चाहिए)।
सात्विक साधना (सर्वोत्तम मार्ग): गृहस्थों और आम साधकों के लिए सात्विक साधनाएं ही सबसे सुरक्षित और श्रेष्ठ मानी गई हैं, जैसे- हनुमान साधना, मां दुर्गा साधना, मां वाराही साधना, वैष्णवी साधना, योग साधना, मनःशक्ति योग साधना आदि।
सिद्धियों के लिए करें 5 प्रमुख कार्य:
1. पूर्ण त्याग
वर्जित खाद्य पदार्थ: इन चार महीनों में तेल से बनी चीजें, दूध, शक्कर, दही, बैंगन, हरी पत्तेदार सब्जियां, नमकीन, प्याज, लहसुन, उड़द की दाल, तीखा या मसालेदार भोजन, मिठाई और सुपारी का सेवन न करें। मांस और मदिरा जैसे तामसिक पदार्थों से पूरी तरह दूर रहें।
विकारों का त्याग: इन 4 महीनों में क्रोध, ईर्ष्या, असत्य वचन, कटु वचन और अभिमान जैसे नकारात्मक भावनात्मक विकारों को अपने भीतर से निकाल दें।
भौतिक सुखों से दूरी: सभी प्रकार की विलासिता की वस्तुओं और आधुनिक गैजेट्स जैसे मोबाइल, टेलीविजन, रेडियो आदि से दूरी बना लें ताकि ध्यान केंद्रित रह सके।
2. नियमों का करें पालन:
भूमि शयन: चातुर्मास के दौरान पलंग या गद्दे का त्याग कर फर्श (भूमि) पर सोना अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है।
दिनचर्या: प्रतिदिन सूर्योदय से पहले (उषाकाल में) उठना चाहिए और नियमपूर्वक अच्छे से स्नान करना चाहिए। रात्रि में जल्दी सोने का नियम बनाएं।
मौन का पालन: व्यर्थ की बातों और अनावश्यक वार्ताओं का पूरी तरह त्याग करें। अधिकतर समय मौन रहने का प्रयास करें।
खान-पान और आहार का नियम: एकभुक्त व्रत: दिन में केवल एक ही बार (एक समय) सात्विक और उत्तम भोजन ग्रहण करना चाहिए।
3. जप, ध्यान और योग साधना:
आपको यह तरह करना है कि कौनसी सिद्धि प्राप्त करना है उसी के अनुसार आपको- त्रिकाल ध्यान, त्रिकाल संध्या, मंत्र या नाम जप या योग साधना का चयन करना होगा।
त्रिकाल ध्यान: प्रतिदिन सुबह और शाम को 40-40 मिनट का ध्यान (Meditation) करें और सूर्य नमस्कार का अभ्यास करें। रात को सोने से पहले भी 20 मिनट ध्यान में बैठें।
मंत्र और नाम जप: आप चाहें तो अपने इष्ट देव के नाम का निरंतर मानसिक जप करते रह सकते हैं। किसी विशिष्ट मंत्र की सिद्धि के लिए इस अवधि में अनुष्ठान किया जा सकता है।
योग साधना: योग शास्त्र में कई सिद्धियों और उन्हें प्राप्त करने के प्रामाणिक तरीकों का वर्णन मिलता है। किसी योग्य मार्गदर्शन में उनमें से किसी एक विधा को साधने का प्रयास करें।
4. कल्पवास और गहन साधना
यदि ऊपर बताए गए नियम और अनुशासन घर पर रहकर निभाना संभव न हो, तो इस अवधि में कल्पवास करना सबसे उत्तम मार्ग है। इसके लिए आप किसी एकांत स्थान या गुरु के आश्रम में वास कर सकते हैं। यहां रहकर आप सभी यम नियमों का पालन कर सकते हैं। कल्पवास में निम्नलिखित कार्य करें।
तप और ब्रह्मचर्य: निश्चित तिथि या नियमों के अनुसार मानसिक संयम और पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए व्रत रखकर साधना की जाती है। साधक इस दौरान भूमि पर ही सोते हैं।
मौन से मानसिक शक्ति का विकास: मौन रहने से मन की बिखरी हुई ऊर्जा एकत्रित होती है और इच्छाशक्ति बढ़ती है। मौन रहकर मानसिक हलचलों को धीरे-धीरे शांत किया जाता है, जिससे साधक अपने मूल लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित कर पाता है।
सत्संग: इस अवधि में उच्च कोटि के साधुओं के साथ सत्संग करना भी विशेष लाभ देता है।
नियमित त्रिकाल जप: उषाकाल में जागकर और शुद्ध होकर सुबह, दोपहर, शाम और रात्रि के समय निर्धारित संख्या में मंत्रों का जाप किया जाता है। माना जाता है कि चातुर्मास में किए गए मंत्र जप जल्दी सिद्ध होते हैं; विशेषकर साबर मंत्रों की सिद्धि इस समय बहुत शीघ्र होती है।
