Jhulelal jayanti: भगवान झुलेलाल की आरती, पूजा विधि, मंत्र, चालीसा, कथा
Cheti chand 2026: भगवान झूलेलाल (वरुण देव) की पूजा विशेष रूप से चेटीचंड (सिंधी नववर्ष) के अवसर पर की जाती है, जो वर्ष 2026 में 20 मार्च को मनाया जाएगा। उनकी पूजा मुख्य रूप से जल और ज्योति (अग्नि) के माध्यम से की जाती है। यहां प्रस्तुति है पूजा के साथ ही आरती, मंत्र, चालीसा और कथा।
1.भगवान झुलेलाल की आरती
2.भगवान झुलेलाल की पूजा विधि
3.भगवान झुलेलाल का मंत्र
4.भगवान झुलेलाल की चालीसा
5.भगवान झुलेलाल की कथा
1.भगवान झुलेलाल की आरती
।। भगवान झूलेलाल की आरती ।।
जय जय झूलेलाल, जय जय उदेरोलाल।
भक्तों के प्रतिपाल, सदा करो निहाल॥
वरुण देव के अवतार, सागर के तुम स्वामी।
दीन-दुखियों के सहायक, अंतरयामी॥
जय जय झूलेलाल...
सिंध देश में जन्म लियो, नसरपुर के वासी।
मिरक शाह को पाठ पढ़ायो, काटी यम की फांसी॥
जय जय झूलेलाल...
हाथ में सोहे पल्लव, गले में रत्न माला।
ज्योति की लौ से चमके, मुखड़ा तेरा निराला॥
जय जय झूलेलाल...
मछली पर सवारी सोहे, दरिया के तुम राजा।
शरण तुम्हारी जो भी आए, सिद्ध करो काजा॥
जय जय झूलेलाल...
चेटीचंड का पर्व निराला, सब मिलकर गाएं।
अमरलाल की कृपा से, सब खुशियां पाएं॥
जय जय झूलेलाल...
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झूले झूले झूले झूलुलाल...
आयो लाल झुलेलाल.
लाल उदेरो रत्नाणी
करी भलायूं भाल....
आयो लाल झुलेलाल.
असीं निमाणा ऐब न आणा
दूला तूहेंजे दर तें वेकाणा
करीं भलायूं भाल...
आयो लाल झुलेलाल.
झूले झूले झूले झुलेलाल...
2.भगवान झुलेलाल की पूजा विधि
आवश्यक सामग्री (बहराणा साहिब)
सिंधी समाज में झूलेलाल जी की पूजा के थाल को 'बहराणा साहिब' कहा जाता है। इसमें निम्नलिखित चीजें अनिवार्य हैं:
आटे का दीया: गूँधे हुए आटे से बना एक बड़ा पंचमुखी दीपक।
अक्खा: पानी में भीगे हुए चावल और चीनी।
अन्य: इलायची, बादाम और मिश्री: प्रसाद के रूप में।
अन्य: इलायची, बादाम और मिश्री: प्रसाद के रूप में।
नारियल: कलावा (मौली) से लिपटा हुआ।
फल और फूल: ताजे फल और माला।
सिंदूर और अक्षत: तिलक के लिए।
पूजा की चरणबद्ध विधि
कलश स्थापना: एक तांबे के कलश में शुद्ध जल भरकर उस पर नारियल रखें। इसे वरुण देव का प्रतीक माना जाता है।
ज्योति प्रज्वलित करना: आटे के दीपक में शुद्ध घी डालकर उसे जलाएं। यह 'ज्योति साहिब' भगवान झूलेलाल के तेज का प्रतीक है।
अक्खा अर्पण: भीगे हुए चावल और चीनी (अक्खा) को कलश और ज्योति के पास अर्पित करें।
पल्लव (प्रार्थना): अपने पल्लू (दुपट्टे या रूमाल) को दोनों हाथों से फैलाकर भगवान से प्रार्थना करें। इसे 'पल्लव पाइणु' कहते हैं। इसमें सुख-समृद्धि और विश्व शांति की कामना की जाती है।
भजन और छेज: भगवान के भजनों पर पारंपरिक नृत्य किया जाता है जिसे 'छेज' कहते हैं।
विशेष भोग और प्रसाद: झूलेलाल जी की पूजा में 'ताहिरी' (मीठे चावल) और 'छोले' (उबले हुए काले चने) का प्रसाद विशेष रूप से बनाया और बांटा जाता है।
विसर्जन (दरिया शाह की पूजा)
झूलेलाल जी जल के देवता हैं, इसलिए पूजा के अंत में 'बहराणा साहिब' को किसी नदी, तालाब या समुद्र (दरिया शाह) के पास ले जाया जाता है:
जल के किनारे पहुंचकर दीपक की आरती करें।
पूरे बहराणा साहिब (दीपक, अक्खा और फूल) को सम्मानपूर्वक जल में प्रवाहित करें।
मछलियों को दाना या अक्खा खिलाना अत्यंत शुभ माना जाता है।
पूजा का समापन: जयघोष
पूजा के दौरान और अंत में यह नारा जरूर लगाया जाता है:
"जियैं झूलेलाल! बेड़ा ही पार!"
(अर्थ: झूलेलाल की जय हो, वे हमारी जीवन रूपी नैया पार लगाएंगे)
3.भगवान झुलेलाल का मंत्र
मुख्य एकाक्षरी/बीज मंत्र: "ॐ वरुणाय नमः"
सफलता और बेड़ा पार करने का मंत्र: "झूलेलाल... बेड़ा ही पार!"
पल्लव (प्रार्थना) मंत्र:
"अचो उदेरोलाल, कंहिं जी रखजे पाल।"
"मुहिंजा झूलेलाल, सभनी जी रखजे पाल।"
दरिया शाह (नदी) को अर्पण करने का मंत्र: "लाल जा जाली, दरिया शाह जा वाली।"
4.भगवान झूलेलाल की चालीसा
।। श्री झूलेलाल चालीसा ।।
॥ दोहा ॥
जय जलपति वरुण देव, जय-जय उदेरोलाल।
भक्तन के तुम रक्षक हो, काटो सकल जंजाल॥
नसरपुर में जन्म लियो, जन हित कीन्हा काम।
शरण तुम्हारी जो आए, सिद्ध करो सब काम॥
॥ चौपाई ॥
जय-जय-जय झूलेलाल सुजाना, वरुण देव तुम हो भगवाना।
दीन-दुखी के तुम हो स्वामी, सबके मन की अंतरयामी॥
मिरक शाह जब अति घबराया, चरणों में आ शीश नवाया।
अत्याचारी शासक भारी, हिंदू जनता थी भयकारी॥
तब तुमने अवतार लिया था, सबको अभय दान दिया था।
रतनराय के तुम कहलाए, देवकी माता के मन भाए॥
मछली की तुम की सवारी, महिमा तेरी जग से न्यारी।
हाथ पल्लव और सोहे माला, मुख मंडल है अति विशाला॥
श्वेत वस्त्र सोहे तन भारी, ज्योति तुम्हारी सबसे न्यारी।
भक्त जनन के काज संवारे, संकट में तुम बने सहारे॥
सिंध देश की रक्षा कीनी, दुष्टों को तुम शिक्षा दीनी।
सर्वधर्म समभाव सिखाया, प्रेम मार्ग सबको दिखलाया॥
जो नर तेरा ध्यान लगावे, मनवांछित फल सो नर पावे।
अक्खा और प्रसादी पावे, दरिया किनारे ज्योत जगावे॥
'लाल साँई' तुम अंतर्यामी, हम सबके हो तुम ही स्वामी।
कष्ट हरो और सुख बरसाओ, अपनी शरण में हमें लगाओ॥
चेटीचंड का पर्व निराला, सब गाएं तेरा गुणगाला।
'झूलेलाल' का नारा गूंजे, भक्त हृदय में तुमको पूजे॥
॥ दोहा ॥
कठिन समय में जो जपे, तेरा नाम उदार।
उसकी नैया पार हो, कर दो बेड़ा पार॥
दूसरी चालीसा:
॥दोहा॥
जय जय जल देवता, जय ज्योति स्वरूप।
अमर उडेरो लाल जय, झुलेलाल अनूप॥
॥चौपाई॥
रतनलाल रतनाणी नंदन।
जयति देवकी सुत जग वंदन॥
दरियाशाह वरुण अवतारी।
जय जय लाल साईं सुखकारी॥
जय जय होय धर्म की भीरा।
जिन्दा पीर हरे जन पीरा॥
संवत दस सौ सात मंझरा।
चैत्र शुक्ल द्वितिया भगऊ वारा ॥4॥
ग्राम नसरपुर सिंध प्रदेशा।
प्रभु अवतरे हरे जन कलेशा॥
सिन्धु वीर ठट्ठा राजधानी।
मिरखशाह नऊप अति अभिमानी॥
कपटी कुटिल क्रूर कूविचारी।
यवन मलिन मन अत्याचारी॥
धर्मान्तरण करे सब केरा।
दुखी हुए जन कष्ट घनेरा॥8॥
पिटवाया हाकिम ढिंढोरा।
हो इस्लाम धर्म चाहुँओरा॥
सिन्धी प्रजा बहुत घबराई।
इष्ट देव को टेर लगाई॥
वरुण देव पूजे बहुंभाती।
बिन जल अन्न गए दिन राती॥
सिन्धी तीर सब दिन चालीसा।
घर घर ध्यान लगाये ईशा ॥12॥
गरज उठा नद सिन्धु सहसा।
चारो और उठा नव हरषा॥
वरुणदेव ने सुनी पुकारा।
प्रकटे वरुण मीन असवारा॥
दिव्य पुरुष जल ब्रह्मा स्वरुपा।
कर पुष्तक नवरूप अनूपा॥
हर्षित हुए सकल नर नारी।
वरुणदेव की महिमा न्यारी॥16॥
जय जय कार उठी चाहुँओरा।
गई रात आने को भौंरा॥
मिरखशाह नऊप अत्याचारी।
नष्ट करूँगा शक्ति सारी॥
दूर अधर्म, हरण भू भारा।
शीघ्र नसरपुर में अवतारा॥
रतनराय रातनाणी आँगन।
खेलूँगा, आऊँगा शिशु बन॥20॥
रतनराय घर ख़ुशी आई।
झुलेलाल अवतारे सब देय बधाई॥
घर घर मंगल गीत सुहाए।
झुलेलाल हरन दुःख आए॥
मिरखशाह तक चर्चा आई।
भेजा मंत्री क्रोध अधिकाई॥
मंत्री ने जब बाल निहारा।
धीरज गया हृदय का सारा ॥24॥
देखि मंत्री साईं की लीला।
अधिक विचित्र विमोहन शीला॥
बालक धीखा युवा सेनानी।
देखा मंत्री बुद्धि चाकरानी॥
योद्धा रूप दिखे भगवाना।
मंत्री हुआ विगत अभिमाना॥
झुलेलाल दिया आदेशा।
जा तव नऊपति कहो संदेशा ॥28॥
मिरखशाह नऊप तजे गुमाना।
हिन्दू मुस्लिम एक समाना ॥
बंद करो नित्य अत्याचारा।
त्यागो धर्मान्तरण विचारा॥
लेकिन मिरखशाह अभिमानी।
वरुणदेव की बात न मानी॥
एक दिवस हो अश्व सवारा।
झुलेलाल गए दरबारा ॥32॥
मिरखशाह नऊप ने आज्ञा दी।
झुलेलाल बनाओ बन्दी॥
किया स्वरुप वरुण का धारण।
चारो और हुआ जल प्लावन॥
दरबारी डूबे उतराये।
नऊप के होश ठिकाने आये॥
नऊप तब पड़ा चरण में आई।
जय जय धन्य जय साईं ॥36॥
वापिस लिया नऊपति आदेशा।
दूर दूर सब जन क्लेशा॥
संवत दस सौ बीस मंझारी।
भाद्र शुक्ल चौदस शुभकारी॥
भक्तो की हर आधी व्याधि।
जल में ली जलदेव समाधि॥
जो जन धरे आज भी ध्याना।
उनका वरुण करे कल्याणा ॥40॥
॥ दोहा ॥
चालीसा चालीस दिन पाठ करे जो कोय।
पावे मनवांछित फल अरु जीवन सुखमय होय॥
॥ॐ श्री वरुणाय नमः॥
5.भगवान झुलेलाल की कथा
भगवान झूलेलाल को सिंधी समाज में वरुण देव का अवतार माना जाता है। 10वीं शताब्दी में सिंध प्रांत के क्रूर शासक मिरक शाह के अत्याचारों से हिंदुओं की रक्षा करने के लिए उनका जन्म नसरपुर के ठाकुर रतनराय और माता देवकी के यहाँ हुआ। बचपन में उन्हें 'लाल उदयराज' कहा जाता था। जब मिरक शाह ने उन्हें समाप्त करने की योजना बनाई, तब बालक उदयराज ने अपनी दिव्य शक्ति से शाह के महल में आग लगा दी और सेना को बेबस कर दिया। अपनी हार और भगवान की शक्ति देखकर मिरक शाह उनके चरणों में गिर पड़ा। इसके बाद शाह ने अत्याचार छोड़कर सर्वधर्म समभाव का मार्ग अपनाया और उनके सम्मान में एक भव्य मंदिर बनवाया।
प्रमुख बिंदु
अन्य नाम: उदेरोलाल, अमरलाल, जिन्दपीर, और ज्योतिनवारो।
जयंती: चैत्र शुक्ल द्वितीया (चेटीचंड) को इनका जन्मोत्सव मनाया जाता है।
संदेश: उन्होंने समाज को शांति और हिंदू-मुस्लिम एकता का पाठ पढ़ाया।

