कब होगा गौरी व्रत 2026 प्रारंभ, जानें सही डेट, पूजा विधि और महत्व
Gauri Festival 2026: हिंदू धर्म में गौरी व्रत, माता पार्वती को समर्पित एक अत्यंत पवित्र व्रत माना जाता है। यह व्रत आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि यानी देवशयनी एकादशी से शुरू होकर पूर्णिमा/ गुरु पूर्णिमा तक 5 दिनों तक चलता है। यह व्रत मुख्य रूप से अखंड सौभाग्य, सुखी वैवाहिक जीवन, योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति और परिवार की खुशहाली के लिए रखा जाता है।ALSO READ: Vijaya Parvati Vrat 2026: विजया पार्वती व्रत कब से होगा प्रारंभ, क्या है इस व्रत का महत्व
यह पवित्र अनुष्ठान मुख्य रूप से मां गौरी/ माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित है। विशेषकर अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की कामना और विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु तथा वैवाहिक सुख के लिए यह व्रत श्रद्धापूर्वक करती हैं। वर्ष 2026 में गौरी व्रत 25 जुलाई 2026 (शनिवार) से प्रारंभ होकर 29 जुलाई 2026 (बुधवार) तक चलेगा।
गुजरात और पश्चिमी भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा में गौरी व्रत का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तप और व्रत किए थे। उसी स्मृति में गौरी व्रत का पालन किया जाता है। इस दौरान माता गौरी और भगवान शिव की विधि-विधान से पूजा की जाती है तथा सात्विक जीवन अपनाने का विशेष महत्व बताया गया है।
कब होगा गौरी व्रत 2026 प्रारंभ, जानें सही डेट, पूजा विधि और महत्व
गौरी व्रत 2026: सही तिथि और शुभ मुहूर्त
एकादशी तिथि प्रारंभ- 24 जुलाई 2026 को 09:12 ए एम बजे
एकादशी तिथि समाप्त- 25 जुलाई, 2026 को 11:34 ए एम बजे
गौरी व्रत शनिवार, 25 जुलाई 2026 को
25 जुलाई पूजा के शुभ मुहूर्त:
व्रत प्रारंभ/ प्रथम दिन: 25 जुलाई 2026, शनिवार देवशयनी एकादशी को
प्रातःकालीन पूजा: सुबह 07:21 बजे से 09:03 बजे तक
अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:00 बजे से 12:55 बजे तक
प्रदोष काल (संध्या पूजा): शाम 07:17 बजे से रात 08:34 बजे तक
गौरी व्रत बुधवार, 29 जुलाई 2026 को समाप्त
व्रत समापन व पारण/ अंतिम दिन: 29 जुलाई 2026, बुधवार गुरु पूर्णिमा को।
गौरी व्रत का महत्व
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था। इसलिए अविवाहित कन्याएं योग्य, संस्कारी और गुणी पति की प्राप्ति या मनचाहा जीवनसाथी पाने के लिए यह व्रत रखती हैं।
विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन में प्रेम-सौहार्द बनाए रखने के लिए इस व्रत का पालन करती हैं। इस व्रत में 5 दिनों तक बिना नमक का सात्विक भोजन करने से शरीर का शोधन होकर मन में संयम व सकारात्मकता आती है।
गौरी व्रत की सरल एवं सटीक पूजा विधि
गौरी व्रत में 'ज्वारे' बोने और उनके पूजन की मुख्य परंपरा है:
प्रथम दिन ज्वारा बोना: व्रत के पहले दिन एक मिट्टी के पात्र में मिट्टी भरकर उसमें सात प्रकार के अनाज- जैसे गेहूं, जौ आदि बोए जाते हैं।
प्रतिमा स्थापना: पूजा स्थल पर माता गौरी पार्वती और भगवान शिव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
पूजा: प्रतिदिन स्नान-ध्यान के बाद मां गौरी को कुमकुम, अक्षत, सिंदूर, लाल पुष्प और धूप-दीप अर्पित करें। भगवान शिव को जल, बेलपत्र, धतूरा और पुष्प अर्पित करें।
जवारा पर जल का छिड़काव करें और उस पर कॉटन का धागा/ नाड़ा लपेटकर पूजा करें।
कथा और प्रार्थना: गौरी व्रत की कथा का श्रवण करें। माता गौरी की आरती करें और सुख-समृद्धि व अखंड सौभाग्य की प्रार्थना करें।
अलूणा व्रत/ बिना नमक का नियम: इस व्रत के दौरान 5 दिनों तक भोजन में नमक का उपयोग पूरी तरह वर्जित होता है। व्रती केवल दूध, फल या बिना नमक का सात्विक आहार ही ग्रहण करते हैं।
अंतिम दिन विसर्जन एवं पारण: 29 जुलाई को अंतिम दिन की पूजा के बाद ज्वारा को किसी पवित्र नदी या जलाशय में विसर्जित किया जाता है। इसके बाद ही नमक युक्त भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है।
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