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Asha Dooj 2026: आशा दूज या आसों दोज व्रत क्यों रखते हैं, जानें महत्व, पूजा विधि और कथा

Written By WD Feature Desk
Updated: शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026 (10:35 IST)
Asaan Dooj 2026: आशा दूज, जिसे राजस्थान और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में आसों दोज या आस माता का व्रत भी कहा जाता है, मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया (दूज) को मनाया जाता है, हालांकि कई क्षेत्रों में इसे चैत्र या वैशाख में भी करने की परंपरा है।ALSO READ: Vaishakh 2026: वैशाख माह के व्रत त्योहारों की लिस्ट
 
 

यहां विस्तार से जानें व्रत का महत्व, कथा और पूजा विधि सहित खास जानकारी....

 

आशा दूज का महत्व

जैसा कि नाम से स्पष्ट है, 'आशा' यानी उम्मीद। यह व्रत जीवन में नई आशा जगाने और अधूरी इच्छाओं को पूरा करने के लिए रखा जाता है। महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, पुत्र की प्राप्ति और परिवार की खुशहाली के लिए आस माता (आशा माता) की पूजा करती हैं। माना जाता है कि जो स्त्री श्रद्धापूर्वक यह व्रत करती है, उसके जीवन से दरिद्रता और मानसिक कष्ट दूर हो जाते हैं।

कई स्थानों पर यह पर्व मुख्य रूप से भाई-बहन के स्नेह और समर्पण को सम्मानित करता है। आशा दूज का अर्थ है भाई और बहन के बीच विश्वास और सुरक्षा की भावना को मजबूत करना। इस दिन बहनें अपने भाई की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि की कामना करते हुए उन्हें राखी बांधती हैं और भाई अपनी बहन को हर तरह से सुरक्षा और सहयोग का आश्वासन देता है।
 

आशा दूज पूजा विधि

इस व्रत की पूजा सरल लेकिन बहुत आस्थापूर्ण होती है:
 
दीवार पर आकृतियां: घर की दीवार या लकड़ी के पट्टे पर चंदन या गेरू से आस माता की आकृति बनाई जाती है। कई जगह 'भूख माई', 'प्यास माई' और 'नींद माई' की आकृतियां भी साथ बनाई जाती हैं।
 
भोग: पूजा में मुख्य रूप से हलवा और पूरी का भोग लगाया जाता है।
 
बायना निकालना: सास या घर की बुजुर्ग महिला के लिए 'बायना' (फल, मिठाई और कुछ दक्षिणा) निकाला जाता है और उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया जाता है।
 
भोजन: इस दिन व्रती महिला केवल मीठा भोजन ही करती है (नमक वर्जित होता है)।
 
मंगलसूत्र: कुछ क्षेत्रों में महिलाएं इस दिन गोटियों वाला विशेष मंगलसूत्र पहनकर आस माता की पूजा करती हैं।
 

व्रत का उद्यापन

यदि किसी वर्ष घर में बेटे का जन्म हुआ हो या बेटे का विवाह हुआ हो, तो उस वर्ष इस व्रत का उद्यापन किया जाता है। उद्यापन में सात जगह 4-4 पूरी और हलवा रखकर विशेष उपहारों के साथ सास को बायना दिया जाता है।

 

आसों दोज व्रत की कथा

इस व्रत की कई प्रचलित कथाएं हैं, जिनमें से एक मुख्य कथा 'आसलिया बावलिया' की है:
 
प्राचीन समय में एक नगर में 'आसलिया बावलिया' नाम का एक व्यक्ति रहता था। उसे जुआ खेलने की बहुत बुरी लत थी, लेकिन वह स्वभाव से दयालु था और ब्राह्मणों को भोजन कराता था। जुए में सब कुछ हार जाने के कारण उसका परिवार उससे नाराज रहता था।
 
एक बार वह अपना सब कुछ हारकर वन में चला गया। वहां उसे एक बुढ़िया के रूप में आस माता मिलीं। माता ने उसे अपनी शरण में लिया और व्रत का महत्व बताया। आस माता के आशीर्वाद से उसका भाग्य बदल गया। वह जुए में जीता हुआ धन वापस पा गया और नेक रास्ते पर चलने लगा। जब वह घर लौटा, तो उसकी सुख-समृद्धि देख पूरा परिवार दंग रह गया। उसने अपनी मां और पत्नी को आस माता की महिमा बताई, जिसके बाद से घर-घर में 'आसों दोज' की पूजा होने लगी।
 
विशेष नोट: क्षेत्र के अनुसार इसकी तिथि और पूजन सामग्री में थोड़ा बदलाव हो सकता है, इसलिए अपने कुल या क्षेत्र की परंपरा का पालन करना श्रेष्ठ रहता है। इस तरह यह व्रत संतान और सुहाग की लंबी आयु, जीवन के समस्त कष्टों का निवारण तथा इच्छा पूर्ति के लिए रखा जाता है। 
 
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