नाटो के विस्तार में तुर्की ने अड़ाई टांग, एक तीर से दो निशाने

पर रूसी आक्रमण से दहल गए और अब नाटो की अतिशीघ्र सदस्यता चाहते हैं। तुर्की के राष्ट्रपति कह रहे हैं, नहीं होने देंगे, वीटो लगाएंगे।
कहावत है, चौबे चले छब्बे बनने, बनकर आए दुबे! कुछ ऐसा ही इन दिनों रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ भी हो रहा है। गत 24 फ़रवरी को यूक्रेन पर उन्होंने आक्रमण किया था पश्चिमी देशों के सैन्य संगठन नाटो में शामिल होने से उसे रोकने के लिए।

अब हो यह रहा है कि एक देश यूक्रेन के बदले, दो ऐसे यूरोपीय देश जल्द से जल्द नाटो की सदस्यता के लिए अधीर हो रहे हैं, जो अब तक उससे तटस्थ दूरी बनाए हुए थे फ़िनलैंड और स्वीडन। स्वीडन तो दो सदियों से तटस्थ देश रहा है। फ़िनलैंड और उसके बीच की साझी सीमा 614 किलोमीटर लंबी है, जबकि फ़िनलैंड और के बीच की साझी सीमा इसके दोगुने से भी अधिक 1340 किलोमीटर लंबी है।

फिनलैंड और स्वीडन, किसी सौन्य गुटबंदी से दूर, कल्याणकारी लोकतंत्र के आदर्श उदाहरण माने जाते रहे हैं। स्वीडन तो दुनियाभर के शरणार्थियों को उदारतापूर्वक शरण देने के लिए प्रसिद्ध है। यही उदारता तुर्की के के कुपित होने का कारण बन रही है। फिनलैंड और स्वीडन पर उनका आरोप है कि वे कुर्द वर्कर्स पार्टी पीकेके का (जिस पर तुर्की ने प्रतिबंध लगा रखा है) और सीरिया में कुर्द मिलिशिया वाईपीजी का समर्थन करते हैं।

वाईपीजी ने ही सीरिया में एर्दोआन के मनभावन, अल बगदादी वाले इस्लामी स्टेट (आईएस) के दांत खट्टे किए थे। तुर्की के राष्ट्रपति आईएस के बदले कुर्दों के इन दोनों संगठनों को आतंकवादी बताते हैं और कहते हैं कि स्वीडन और फिनलैंड इन आतंकवादी संगठनों के अतिथि गृह बन गए हैं।

उत्तरी यूरोप के ये दोनों देश लंबे समय से तुर्की, सीरिया और ईराक़ में रहने वाले कुर्द अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों के और अमेरिका में रह रहे तुर्की के ही इस्लामी उपदेशक फेतुल्लाह ग्युलेन के समर्थक रहे हैं। एर्दोआन 2016 में उनका तख्ता पलटने की कोशिश के लिए ग्युलेन के अनुयायियों को जिम्मेदार ठहराते हैं। उल्लेखनीय है कि ग्युलेन ही एक समय एर्दोआन के राजनीतिक गुरु हुआ करते थे। तुर्की में जो कुछ भी ऐसा होता है, जो राष्ट्रपति महोदय को पसंद नहीं है, उसका दोष वे कुर्दों के या ग्युलेन के ही माथे मढ़ते हैं।

कुर्द भी मुसलमान हैं। तुर्की के सबसे बड़े सांस्कृतिक अल्पसंख्यक हैं। तुर्की की 7 करोड़ 78 लाख जनसंख्या में से 18 प्रतिशत यानी 1 करोड़ 40 लाख कुर्द हैं। पर हर गाहे-बगाहे उनके रिहायशी इलाकों पर तोपों और टैकों से गोले बरसाए जाते हैं। इस कारण उन्हें लाखों की संख्या में भागकर ऑस्ट्रिया, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड या स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों में शरण लेनी पड़ती है।उन पर हो रहे अत्याचारों की दुनिया में शायद ही कभी चर्चा होती है।

फ़िनलैंड और स्वीडन की संसदों ने नाटो की सदस्यता के लिए आवेदन का अनुमोदन कर दिया है। कहा जा रहा है कि बुधवार,18 मई को दोनों के आवेदन पत्र बेल्जियम की राजधानी ब्रसेल्स में स्थित नाटो के मुखायालय में पहुंच जाएंगे। अब तक यह माना जा रहा था कि नाटो के वर्तमान 30 सदस्य देशों द्वारा फ़िनलैंड और स्वीडन के आवेदनों का अनुमोदन मात्र एक औपचारिकता होगी।पतझड़ आने तक उन्हें पूर्ण सदस्यता मिल जाएगी।

किंतु तुर्की के राष्ट्रपति ने दो ही दिन पहले यह कहकर सबको हक्का-बक्का कर दिया कि वे इन दोनों देशों को नाटो की सदस्यता देने का विरोध करेंगे। अपने वीटो अधिकार का प्रयोग करेंगे। तुर्की 1952 से नाटो का सदस्‍य है। नाटो-संधि के अनुसार नियम यह है कि सदस्यता के किसी नए आवेदन के समय नाटो के जितने भी सदस्य होंगे, उन सबकी स्वीकृति मिलनी चाहिए।यदि एक भी देश अपनी स्वीकृति नहीं देता, तो नया सदस्यता आवेदन स्वीकार नहीं हो सकता।

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन की एक प्रत्यक्ष मांग यह है कि स्वीडन और फिनलैंड में रह रहे तुर्क आतंकवादियों का प्रत्यर्पण किया जाए। पिछले पांच वर्षों में न तो स्वीडन और न ही फिनलैंड ने तुर्की के कुल 33 प्रत्यर्पण अनुरोधों पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। एर्दोआन का एक दूसरा बहाना यह है कि जो देश तुर्की पर कोई प्रतिंबंध लगाते हैं, नाटो में उनकी सदस्यता का हम समर्थन नहीं कर सकते।

लेकिन नाटो के ही एक सदस्य देश लक्सेम्बर्ग के विदेशमंत्री ज़ौं असेलबॉर्न, अंतिम क्षण में एर्दोआन की इस अनोखी अड़ंगेबाज़ी के पीछे एक दूसरा ही कारण देखते हैं। जर्मन रेडियो स्टेशन डोएचलांडफ़ुन्क के साथ मंगलवार के एक इंटरव्यू में असेलबॉर्न ने कहा कि एर्दोआन को कुर्दों के प्रत्यर्पण से नहीं, बल्कि अपनी स्वीकृति की क़ीमत बढ़ाने से मतलब है। उनके नकारात्मक रवैए का इस तथ्य से कुछ लेना-देना हो सकता है कि तुर्की, अमेरिकी हथियारों की ख़रीद पर रियायतों की उम्मीद कर रहा है। तुर्की वास्तव में अमेरिका से एफ-35 युद्धक विमान ख़रीद रहा है, लेकिन उनकी क़ीमतों को लेकर कुछ विवाद है।

इस संदर्भ में उल्लेखनीय है कि 2019 में तुर्की ने जब रूसी S-400 मिसाइल खरीदने का फ़ैसला किया, तब अमेरिका ने इसका ज़ोरदार विरोध किया। अमेरिका का कहना है कि रूस ही तो नाटो का मुख्य विरोधी है, इसलिए नाटो के सदस्‍य देशों को रूस से हथियार नहीं ख़रीदना चाहिए। तुर्की नहीं माना, तो अमेरिका ने भी तुर्की के विरुद्ध कुछ प्रतिबंध लगा दिए और नवीनतम पीढ़ी के अमेरिकी लड़ाकू जेट F-35 खरीदने के तुर्की के साथ अनुबंध को रद्द कर दिया। तुर्की ने तब मुआवज़ा मांगा और कहा कि उसे एफ़-35 नहीं, तो कम से कम पुरानी पीढ़ी के एफ-16 विमान ही दे दिए जाएं।

यह सारा मामला अभी सुलझा नहीं है। हो सकता है कि तुर्की के मूडी राष्ट्रपति रज़ब तैय्यब एर्दोआन ने सोचा हो कि अमेरिका द्वारा वांछित स्वीडन और फिनलैंड की नाटो में अविलंब भर्ती ही वह सुनहरा मौका है, जिसमें टांग अड़ाकर अपना उल्लू आसानी से सीधा किया जा सकता है। इस पैंतरेबाज़ी से लगे हाथ रूसी राष्ट्रपति को भी खुश किया जा सकता है। एक ही तीर से दो निशाने सध जाएंगे। दुनिया उनका लोहा मान लेगी।

तुर्की के अप्रत्यक्ष वीटो खतरे से नाटो के सदस्य देशों में काफी आक्रोश है। जर्मनी और अधिकांश अन्य सहयोगी देश इस बात का स्वागत करते हैं कि फिनलैंड और स्वीडन ने यूक्रेन पर रूस के हमले के जवाब में नाटो की सदस्यता पाने की तैयारी शुरू कर दी है।

नाटो महासचिव येन्स स्टोल्टेनबर्ग ने तुर्की की मांगों को गंभीरता से लेने का आह्वान किया। तुर्की एक महत्वपूर्ण सहयोगी है और सभी सुरक्षा चिंताओं को संबोधित किया जाना चाहिए, स्टोलटेनबर्ग ने सोमवार रात तुर्की के विदेश मंत्री के साथ बात करने के बाद कहा।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने चेतावनी दी है कि फिनलैंड और स्वीडन की नाटो में सदस्यता से तनाव और बढ़ेगा। विशेषकर फ़िनलैंड ने शीतयुद्ध के दिनों में रूस को नाराज़ नहीं करने का हमेशा ख़याल रखा था। उसका हिस्सा रहे कारेलिया नाम के प्रदेश का एक बड़ा भाग 1923 से रूस के पास है।(इस लेख में व्यक्त विचार/ विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/ विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया' इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं लेती है।)



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