एक थी आनंदी .............. !!!

सुंदर बड़ी-बड़ी गोल-गोल चमकती हुई आंखें। दमकता चेहरा। खिलखिलाती हंसी.... अच्छी लगी थी वह आनंदी जब उसने अविका गौर के स्थान पर अपनी दस्तक दी थी... हालांकि कुछ लोगों के लिए एकदम से यूं उसे स्वीकार करना आसान न था क्योंकि आनंदी के रूप में अविका दिल में जगह बना चुकी थी। लेकिन नई आनंदी यानी प्रत्यूषा के भावप्रवण अभिनय ने बहुत जल्द ही दर्शकों को अपनी तरफ आकर्षित कर लिया। सबसे अच्छी लगी थी उसकी मीठी सी आवाज और मासूम सा चेहरा...
> बहरहाल, वह आज हमारे बीच नहीं है अभिनय की तमाम खूबसूरत संभावनाओं को समेट कर वह चली गई है इस क्रूर दुनिया से दूर....लेकिन हवा में तैर रहे हैं कुछ गहरे और गंभीर सवाल.... अगर मित्र राहुल से उनके संबंध ठीक नहीं थे तो क्या आत्महत्या के सिवा कोई रास्ता नहीं बचा था? भावनात्मक संबंध इंसान को इतना कमजोर और कायर  क्यों बना देते हैं कि लगता है कि इस इंसान के बिना जिंदगी नहीं बचेगी। अगर किसी इंसान को आपकी जरूरत नहीं है तो कोई यह समझाने वाला क्यों नहीं है कि फिर आपको भी उसकी जरूरत इस हद तक नहीं होना चाहिए कि मौत के सिवा कोई विकल्प ही ना बचे। हम इतने कच्चे कैसे होते जा रहे हैं कि परिस्थितियों के दंश से बाहर नहीं आ सकते?  जब भी कोई इस तरह से रूखसत होता है तब बॉलीवुड का यह काला सच गंभीर रूप से विचारणीय हो जाता है। 



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