24 जनवरी बालिका दिवस : हो रामा हमरे घर आ जाए बिटिया

बस एक बार चुप्पी टूट जाए फिर देखना बहुत क्षमता है किशोरी में। वह हंसती है तो चांदनी बिछ जाती है धरती पर। वह उछलती है तो लगता है उड़ती हवा को पकड़ लेगी मुटठी में। वह साइकिल चलाती है तो लगता है भीतर और बाहर की गति को एकाकार कर सब कुछ पा लेगी। हैंडल को संभालती है तो लगता है सारी समस्याओं के हल पा लेगी, अपने आत्मविश्वास से। वह काम करने आगे आती है तो लगता है सब कुछ संभाल लेगी काबिलियत
के साथ। पढ़ती है ऐसे जैसे किताबों में डूबकर सारा संसार बांच लेगी। सबसे बढ़कर बेटियां भरोसा जीत लेती हैं। जीवन का सबसे बड़ा काम है भरोसा जीतना।

ग्रामीण अंचल के उस हिस्से में जाते समय मैं बहुत उत्साहित थी। जहां एक परिवार में कन्या जन्म के पश्चात स्थानीय कार्यकर्ता मिलकर छोटा सा आयोजन कर रहे थे। गांव से गुजरते हुए मुझे दीवारों पर लिखे नारे आगाह कर रहे थे कि इस गांव में कन्या को ससम्मान जन्म लेने का हक मिल चुका है। और यह कार्यक्रम गवाही देगा कि जिम्मेदार बखूबी अपना कार्य कर जागरूकता फैला रहे हैं।


सजी-धजी मां अपनी नन्हीं सी बिटिया को गोद में लिए बैठी थी। आसपास गांव की महिलाएं। कुछ बुजुर्ग, कुछ उनकी बहुएं। चार-पांच किशोरियां भी थी जो बड़ी उत्सुकता से इस नजारे को देख रही थीं। कुछ ही देर में ढोलक की थाप पर बधाई गाई जाने लगी। पहली ही लाइन सुनकर मैं अवाक रह गई। बोल थे -
किसने बिछाए देई खटिया....बिछाय देई खटिया,
हाय रामा हमरे तो हो गई बिटिया।


मैं चौंककर उनकी ओर देख रही थी, और महिलाएं हंस-हंसकर गाने में मगन थीं। आगे की पंक्तियां थीं -
अंगना में ठाढ़े ससुर बोले, सुनते ही छूट गई लुटिया
हाय रामा हमरे तो......
अंगना में ठाढ़े देवर राजा बोले, सुनते ही उड़ गई टुपिया
हाय रामा हमरे तो ...

गीत चल रहा था और गीत का अर्थ समझ रही नन्हीं सी बेटी को थामे मां के चेहरे पर आत्मग्लानि के भाव थे। जैसे बेटी को जन्म देकर उसने कोई कसूर कर दिया हो। मुझसे आगे की पंक्तियां सुनते नहीं बनी। मैंने तुरंत गीत रोक दिया। गाने वाली महिलाओं से पूछा- ’पता भी है क्या गा रही हो ?’ कुछ देर चुप्पी के बाद एक बोली, ’ये गीत तो जमाने से चला आ रहा है। हर किसी को बेटी होने पर गाते हैं। हमारी लड़की हुई थी तब भी गाया था। इसमें बुराई क्या है ?’

अब मैं समझी, पूरे देश में बालिका जन्म के प्रति चलाए जा रहे अभियान अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं दे पा रहे। क्यों अब भी पुत्र जन्म की अनिवार्यता हर माता-पिता के मन में गहरे तक बसी हुई है। क्यों सड़कों पर छोड़े जानेवाले नवजातों में कन्या शिशु ही सर्वाधिक होती हैं। क्यों पिता नशे में पटककर अबोध बेटी की हत्या कर देता है। क्यों बेटी को बोझ मानने का सूत्र वाक्य मन से नहीं हट रहा। हम कागजी स्तर पर ढेर सारी योजनाओं का पोंछा लेकर सफाई करने निकले हैं, पर समुदाय में मन के नल तो यथावत चल रहे हैं। नल बंद नहीं हुए तो पोछा लगाना व्यर्थ है।


इस वर्ष बालिका दिवस मनाते हुए मुख्य ध्येय हर किशोरी को उसके अधिकार दिलाना और उनकी क्षमताओं का भरपूर उपयोग करना है।

विश्व पटल के तमाम मंचों पर इस संबंध में चर्चाएं होंगी। लक्ष्य निर्धारित किए जाएंगे। जिम्मेदार उनका पूर्ण होना सुनिश्चित करेंगे।


सभाओं में किए जानेवाले बड़े - बड़े दावे और बड़े बड़े वादे खोखले साबित होते हैं जब जमीनी स्तर पर इस तरह के नजारे देखने को मिलते हैं। गांव के इस कार्यक्रम को गुमसुम नजरों से देख रही किशोरी मन ही मन सपना देख रही होगी कि क्या हो जिससे मेरी बेटी होने पर इस तरह का गीत न गाया जाए।


बस एक बार चुप्पी टूट जाए फिर देखना बहुत क्षमता है किशोरी में। वह हंसती है तो चांदनी बिछ जाती है धरती पर। वह उछलती है तो लगता है उड़ती हवा को पकड़ लेगी मुटठी में। वह साइकिल चलाती है तो लगता है भीतर और बाहर की गति को एकाकार कर सब कुछ पा लेगी।

हैंडल को संभालती है तो लगता है सारी समस्याओं के हल पा लेगी, अपने आत्मविष्वास से। वह काम करने आगे आती है तो लगता है सब कुछ संभाल लेगी काबिलियत
के साथ। पढ़ती है ऐसे जैसे किताबों में डूबकर सारा संसार बांच लेगी। सबसे बढ़कर बेटियां भरोसा जीत लेती हैं। जीवन का सबसे बड़ा काम है भरोसा जीतना।


ये सब करते हुए हम बेटियों को तब देख पाएंगे तब वे ससम्मान हर घर में जन्म लें। उनके जन्म की खबर हर चेहरे की खुशी का कारण बन जाए। बेटी के जन्म लेते ही दादी, बुआ, चाची, मासी सब स्वागत को आतुर हों। बेटियों के लिए नए गीत रचे जाएं, नये सूत्रवाक्य बनें, नई कहावते बनें, नए मुहावरे गढ़े जाएं।


हां , उस कार्यक्रम से आते वक्त मन कह रहा था, हमारे प्रयास वह दिन लाएं जब बेटा होने पर महिलाएं गाएं-
अबके बिछाय देना खटिया, हो रामा हमरे घर आ जाए बिटिया।



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