विचार कुंभ : परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास

साध्वी भगवती ने कहा कि बड़ा होना जरूरी नहीं, बल्कि बढ़िया होना जरूरी है, यह भाव भारतीय जनमानस में पैदा करने हेतु अभियान चलाया जाना चाहिए। नारी के अंदर विद्यमान अच्छे संस्कारों को प्रोत्साहित करने हेतु 'शुभ शक्ति' नामक योजना संचालित की जानी चाहिए।
शिवभरत गुप्त ने कहा कि स्त्री के चरित्र को लांछित करने वाले लोगों और कथनों को रोकने के लिए एक विशेष कानून होना चाहिए। स्त्री की प्रकृति के अनुरूप रोल मॉडल तैयार करना चाहिए, जो उनके अनुकूल हो। स्त्रियों के सशक्तीकरण के लिए केवल आरक्षण एकमात्र समाधान नहीं है, उसके लिए एक सोशल रोल मॉडल तैयार करना होगा। ऐसी सामाजिक और नई संस्थाएं बनानी होंगी जिससे परिवार और बच्चों के साथ-साथ महिलाओं के अकेलेपन को दूर किया जा सके, इसके लिए भी महिलाओं को ही जिम्मेदारी सौंपनी होगी।
यूएन वीमेन की सदस्य अंजू पांडे ने कहा कि कार्यशील महिलाओं के कार्य या गृहकार्य का भी मूल्यांकन होना चाहिए। महिलाओं के अनपेड वर्क पर ध्यान केंद्रित कर उस पर भी विमर्श होना चाहिए। पुरुषों की मानसिक स्थिति बदलने के लिए भी सरकारी प्रयास किए जाने चाहिए।

निवेदिता बिड़े ने कहा कि समाज में महिलाओं के प्रति सोच बदलने एवं उनका आदर करने के लिए जनजाग्रति हेतु योजनाएं बनाई जाएं। स्त्री-पुरुष में समानता एवं भ्रूण हत्या रोकने से समाज में एकात्मता एवं आत्मीयता का भाव उत्पन्न होगा।
गीता बलवंत गुण्डे ने कहा कि समाज में लिंगभेद के प्रति सामाजिक संवेदना पैदा करने की आवश्यकता है। भारतीय विकास की अवधारणा के आधार पर बाल विकास को मॉडल बनाया जाना चाहिए। शिक्षा के द्वारा महिलाओं में आत्मविश्वास को बढ़ाए जाने की नीति बनाने की आवश्यकता है।

स्वामिनी विमला नंदनी ने कहा कि बच्चों में बाल्यकाल की आयु में संपूर्ण विकास की कार्ययोजना बने। मां के गर्भ से ही कन्या के प्रोत्साहन को बढ़ावा दिया जाए।
में 45 देशों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया। विभिन्न मुद्दों पर विदेशी वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे।

श्रीलंका के वरिष्ठ सलाहकार सतत विकास एवं वन मंत्रालय मिस्टर उच्चिता डि जोयसा ने पर्यावरण परिवर्तन और सतत विकास पर चर्चा करते हुए कहा कि हमें विकास के साथ संरक्षण पर बल देना चाहिए। सतत स्थायी विकास पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। भविष्य की पीढ़ी और पर्यावरण को ध्यान में रखकर ही विकास करना चाहिए। विश्व के 193 देशों द्वारा न्यूयॉर्क में किए गए पर्यावरणीय विमर्श और उसके निष्कर्षों को संपूर्ण विश्व मंच पर लागू किए जाने के प्रयास किए जाने चाहिए। पृथ्वी के भविष्य पर चिंतन करना अनिवार्य है। पर्यावरणीय स्तर पर नवीन विश्व नीति को तैयार करना चाहिए। गरीबी के लिए भोजन, स्वास्थ्य, स्वच्छ जल, प्रदान करने हेतु प्रयास किए जाने चाहिए।
अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित सिटी यूनिवर्सिटी की प्रो. रेबेक्का ब्रेट्सपीस ने कहा कि भोजन के मानकीकरण और फूड सिक्योरिटी को बढ़ावा देने के साथ ही भोजन की बर्बादी को राकने हेतु विशेष प्रयास किए जाने चाहिए।

अमेरिका की ओक्लाहामा यूनिवर्सिटी के डॉ. सुभाष ने कहा कि प्राचीन धंधों या प्राचीन व्यवसाय पद्धतियों को लुप्त होने से बचाने का प्रयास करना चाहिए। भारतीय संस्कृति के पर्यावरणीय पक्षों को उजागर करने पर बल देना चाहिए। आत्मविद्या और प्राचीन भारतीय विज्ञान को प्रसारित करना चाहिए। जड़-चेतनमय विज्ञान के विकास पर बल देना चाहिए।
संयुक्त राज्य अमेरिका से आए वैदिक शिक्षाविद् डेविड फ्राले (पं. वामदेव शास्त्री) ने कहा कि आयुर्वेद और योग वेदांत का आधुनिकीकरण करना चाहिए ताकि वह अत्यधिक प्रभावी बन सके। एलोपैथिक की अपेक्षा आयुर्वेद पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। आयुर्वेद और योग की शिक्षा प्रत्येक बच्चे को बाल्यावस्था से दिया जाना अनिवार्य होना चाहिए।

संयुक्त राज्य अमेरिका के ही वैदिकवेत्ता माइकल ए. क्रीमो (धुरपद कर्मा) ने कहा कि वैदिक ज्ञान और संस्कृति के अध्ययन को बढ़ावा देना चाहिए। शांति और सद्भाव के गुरुकुल शिक्षा को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
अमेरिका से आई योगिनी साम्भवी ने कहा कि समझ हमारी मूल प्रकृति है। सबसे पहले हमें अपने आपको ही समझने की आवश्यकता है।

दक्षिण कोरिया के प्रो. गी लोंग ली ने कहा कि दर्द से हमें भागना नहीं चाहिए, हम इसी के माध्यम से विवेक, मुक्ति और निर्वाण प्राप्त कर सकते हैं।

जापान से आए यसुआ कामाता ने कहा कि हर किसी को पूर्णतावादी सोच की ओर बढ़ना चाहिए। संकीर्ण मानसिक स्थिति से बचना चाहिए।
थाईलैंड से आए पर्यावरणविद् बिक्कुनी धर्मनंदा ने कहा कि महिलाएं पहले से ही सशक्त हैं, बस उनकी शक्ति को छीना न जाए, उन्हें आगे बढ़ने का भरपूर मौका दिया जाना चाहिए। उन्हें आगे बढ़ने के पर्याप्त अवसर प्रदान करने चाहिए।

कम्बोडिया के गेसी सम्पटेन ने कहा कि योग मनुष्य का अंतिम सत्य है और किसी किताब से आप इसे नहीं सीख सकते, इसे केवल अभ्यास से ही सीखा जा सकता है अतः योग और ध्यान के व्यावहारिक पहलू पर ध्यान देना चाहिए। कम्बोडिया के ही सोन सुबर्ट ने कहा कि किसान जो हमारा पेट भरते हैं, उनके आत्मसम्मान और गरिमा का सरकार को विशेष ध्यान रखना चाहिए।
बांग्लादेश के मुख्य सूचना आयुक्त मोहम्मद गुलाम रहमान ने कहा कि मीडिया को महिलाओं के सकारात्मक स्वरूप और उनके लिए अनुकूल वातावारण तैयार करने हेतु भरसक प्रयास करने चाहिए।

डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि मीडिया की स्वतंत्रता के साथ उसकी विश्वसनीयता बनी रहे, इसके लिए भारतीय प्रेस परिषद की तरह एथिकल रेगुलेटरी अथॉरिटी बनाने की आवश्यकता है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया की तरह ही पत्रकारों का भी पंजीकरण जरूरी होना चाहिए। पत्रकार बनने के लिए न्यूनतम मानदंड स्थापित करने की आवश्यकता है।
सक्रांत सानु ने कहा कि पारंपरिक शिक्षा पद्धति को पुनर्जीवित करना होगा। मीडिया की विश्वसनीयता को बढ़ाने के लिए पत्रकारों को प्राप्त सुविधाओं का पत्रकारों द्वारा खुलासा किया जाना चाहिए। कोई भी देश अपनी भाषा के बिना विकसित नहीं हो सकता, लिहाजा मातृभाषा में शिक्षण तंत्र को विकसित करने की आवश्यकता है।

प्रो. टीएन सिंह ने कहा कि शिक्षात्मक उपलब्धियों को जनमाध्यमों द्वारा सही माध्यम से सही लोगों तक पहुंचाना चाहिए। मीडिया को खबरें उन्हीं संदर्भों में दिखानी चाहिए, जो समाज के लिए उपयोगी हैं। शिक्षा के क्षेत्र में जो अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें मीडिया द्वारा महत्व दिया जाना चाहिए।
डॉ. विनय सहस्त्रबुद्धे ने स्वच्छता पर चर्चा करते हुए कहा कि जिस ग्रामीण परिवार के पास अपना शौचालय नहीं होगा, उसे चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी कीमत पर पानी को खुला न छोड़ा जाए।

पुडुचेरी स्थित अरबिन्दो आश्रम के श्रद्धालु रनाडे ने कहा कि हर किसी को चाहिए कि वह अपने में सातत्य भाव, एकत्व भाव, अनंतता बोध और भारतीय बोध का विस्तार करता रहे।
विचार कुंभ आयोजन समिति के अध्यक्ष अनिल माधव दवे ने जैविक खेती को प्रोत्साहित करने पर बल देते हुए कहा कि किसानों को शून्य बजट खेती के लिए (सुभाष पालेकर मॉडल) प्रेरित किया जाए। देशी गायों को प्रत्येक परिवार में पालकर कृषि को संबल दिया जा सकता है।

अंतरराष्ट्रीय विचार महाकुंभ के आयोजन के माध्यम से भारत की गौरवशाली परंपरा को जीवित रखने का प्रयास किया गया। जिस प्रकार वक्ताओं ने देश और समाज से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श किया और जनहित में कार्य करने का आह्वान किया, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि विचार महाकुंभ अपने उद्देश्य में सफल रहा है।



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