दरिद्रता की विचलित करने वाली घटनाएं...

Author शांति कुमार टेंग्शे| Last Updated: मंगलवार, 7 जुलाई 2020 (12:19 IST)
शांति कुमार टेंग्शे

एक रजवाड़े से जुड़ी वास्तविक घटना है। एक ने तत्कालीन राजा को टेनिस खेलते हुए देखा और सगर्व अपने मित्र को बतलाया कि उसने राजा को देखा है। दूसरे दिन क्लब में बुलाकर चोरी-छिपे उसे भी राजा के दर्शन करवा दिए। उनकी बातचीत एक रिटायर्ड प्रिंसीपल ने सुनी। राजा को देखकर अभिभूत मित्र कह रहा था कि राजा कितना रौबदार और खूबसूरत है, उसके पास कितनी बड़ी मोटर कार है।
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राजा के पास तो बहुत पैसे होंगे तो मजदूर ने बतलाया कि राजा के पास तो ढेर सारे पैसे होते हैं। अगला मासूम कथन था 'फिर तो वह चाहे तो पेट भर गुड़ खा सकता है'! सोचिए, अमीरी को लेकर उस गरीब की कल्पना पेट भर गुड़ खाने तक ही सीमित थी। प्रिंसीपल साहब का भावुक कचोट उठा और यह बात उन्होंने राजा के कानों तक पहुंचा दी। राजा ने उन दोनों मित्रों को महल में बुलवाया, आग्रह और प्रेमपूर्वक उन्हें पेट भर स्वदिष्ट भोजन कराया और गुड़ की 2-2 भेलियां भेंट कर उन्हें बिदा किया।

जीवन में दरिद्रता के दर्शन ने कई बार मुझे किया है और मैं भी उन्हें भूल नहीं पाता। पिताजी के एक मित्र कश्मीर से 2 पेटी सेब लाए थे। कुछ फल दबकर खराब हो चुके थे अत: उन्हें फेंक दिया गया। दूसरे दिन सुबह क्या देखता हूं कि एक आदमी घूरे पर पड़े उन फलों को छांट-छांटकर अपने गमछे से साफ कर खा रहा है। मुश्किल से 6 वर्ष की उम्र रही होगी। यह देखकर मन अंदर ही अंदर रो उठा कि घूरे पर पड़ी हुई वस्तु को कैसे कोई खा सकता है?
इस घटना के करीब साल डेढ़ साल बाद की बात है। मोहल्ले में एक नाटक देखा था। बाजार से लौटी विधवा सास बचे हुए पैसे विधवा बहू को सौंपते हुए कहती है कि सौदा 6 आने का हुआ। नन्हा मिठाई के लिए जिद कर रहा था, सो धेले का गुड़ भी लाई हूं। यद्यपि अमीरी-गरीबी, पैसे का अभाव आदि समझने की उम्र नहीं थी, परंतु नाटक देखकर मन बहुत दुखी हुआ था कि बच्चे को मिठाई की जगह गुड़ से कैसे बहलाया जा सकता है। गरीब सास-बहू की मजबूरी, छोटी-सी ढिबरी से प्रकाशित घर का परिवेश तथा थकी-थकी आवाज में उनकी बातचीत ने मेरे बाल मन को बहुत व्यथित किया था और आज भी वह सब कुछ अक्सर आंखों के आगे आ जाता है।
कड़कड़ाती ठंड में फटी-पुरानी साड़ियों में सुबह-सुबह मजदूरी के लिए जातीं महिलाओं और मात्र उटंग पायजामे-कुरते में मासूम बच्चों को कालीन कारखाने में काम के लिए जाते देखना भी बहुत विचलित कर जाता था। ब्रांच लाइन के एक छोटे से स्टेशन पर ट्रेन में चढ़ी एक गरीब महिला और उसके छोटे से बच्चे का चेहरा भी अक्सर आंखों के आगे आता है। खाली पड़ी बेंच पर सकुचाती-सी बैठ गई वह।
बच्चे ने बैठते ही साथ भूख लगने का कहते हुए कुछ खाने की मांग की तो मां के चेहरे पर विवशता के अजीब से भाव दिखे। अनमनी-सी होकर उसने एक सूखी रोटी उसे पकड़ा दी जिसे वह तृप्तिपूर्वक चबा-चबाकर खाने लगा। निरपेक्ष भाव से सूखी रोटी चबाते उस मासूम का चेहरा भुलाए नहीं भूलता। मन में आया था कि अपने टिफिन से निकालकर थोड़ी सब्जी-मिठाई उसे दूं, परंतु खिड़की से बाहर देखता चुपचाप बैठा रहा कि कहीं उस मां के स्वाभिमान को चोट न पहुंचे।
एक और घटना अक्सर याद आती है। एक में जूठे पत्तलों के ढेर पर भिखारी-सा लगने वाला एक आदमी आकर चुन-चुनकर कुछ खाने लगा। 8-10 सूअरों का एक झुंड भी आ गया तो वह उन्हें डराकर भगाने लगा। सूअरों के मालिक ने इस बात पर उसे बुरी तरह पीटकर उसे हटा दिया। आदमी, आदमी के प्रति कितना निष्ठुर हो सकता है, यह देखकर मन बहुत भारी हो रहा था। खाने के लिए एक मित्र बुलाने आए तो धीरे से 10 का 1 नोट उस गरीब को देकर अंदर गया तो सही, पर भोजन उस दिन गले से मुश्किल से उतरा।

शहीद भगत सिंह का कथन याद करता हूं, 'क्या तुम्हें पता है कि गरीब होना दुनिया में सबसे बड़ा पाप है? गरीबी एक अभिशाप है, एक सजा है।'
(फ़ाइल चित्र)

(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण 'वेबदुनिया' के नहीं हैं और 'वेबदुनिया' इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है।)



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