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2003 में दिग्विजय की तरह 2018 के चुनावी रण में शिवराज भी पड़े अकेले...

Updated: रविवार, 11 नवंबर 2018 (11:42 IST)
भोपाल। मध्यप्रदेश 15 साल से सत्ता में काबिज भाजपा इस बार भी अपने चुनावी कैंपेन में दिग्विजय सिंह की पंद्रह साल पुरानी सरकार के कामकाज पर सवाल उठा रही है। प्रदेश कांग्रेस में चुनाव के समय समन्वय का काम देख रहे दिग्विजय सिंह का कहना है कि आज मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पूरी तरह अकेले पड़ गए है, ठीक उसी तर्ज पर जब वे 2003 में अकेले पड़ गए थे।
 
 
शिवराज सिंह अपनी हर चुनावी सभा में दिग्विजय सिंह को टारगेट करते हुए लोगों को कांग्रेस की सरकार के दिनों की याद दिलाते है, ऐसे में अब कांग्रेस की ओर से खुद दिग्विजय ने शिवराज सिंह को टारगेट करने का जिम्मा संभाला है। 
 
दिग्विजय सिंह ने कहा कि जिस तरह 2003 के विधानसभा चुनाव के समय वे खुद अकेले पड़ गए थे, ठीक आज 15 साल बाद मुख्यमंत्री शिवराज भी अकेले पड़ गए हैं। दिग्विजय सिंह ने कहा कि 2008, 2013 और आज की स्थिति में बहुत अंतर है। वो खुद पिछले दो चुनावों में प्रदेश से दूर थे लेकिन इस बार प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाकर ही बैठेंगे। 
 
दिग्विजय सिंह ने प्रदेश में बागी हुए नेताओं को मनाने का जिम्मा संभाल लिया है। भोपाल में डेरा डालते हुए वे पीसीसी से पूरे प्रदेश के बागी नेताओं को मनाने का काम कर रहे हैं। दिग्विजय सिंह के शिवराज सिंह चौहान के अकेले पड़ने की बात कहने के बाद सियासी गलियारों में ये चर्चा जोर शोर से तेज हो गई है कि मुख्यमंत्री जो संभवत: अब तक के सबसे कठिन चुनावी हालत का सामना कर रहे हैं, क्या वे चुनावी रण में अकेले पड़ गए हैं? 
 
वेबदुनिया ने पहले ही अपनी खबर में इस बात को विस्तार से बताया था कि कैसे शिवराज सिंह चौहान चुनाव के समय अकेले पड़ते जा रहे हैं। मध्यप्रदेश में चुनाव से जिस तरह केंद्रीय नेतृत्व ने दूरी बनाई है, वह भी किसी से छुपी नहीं है। 
 
चुनाव से पहले जहां पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के भोपाल में कैंप करने की चर्चा चल रही थी, वो चुनाव के समय पूरी तरह निराधार सबित हुई, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी कैंपेन की तुलना में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के हर अंचल में जाकर चुनावी रैली करना भी सियासी गलियारों में काफी चर्चा के केंद्र में है। 
 
दूसरी ओर मध्यप्रदेश में चौथी बार सरकार बनाने के लिए शिवराज अकेले पूरे प्रदेश में चुनावी सभा कर रहे हैं। पहले जहां जन आशीर्वाद यात्रा के जरिए मुख्यमंत्री ने पूरे प्रदेश को नाप दिया था, वहीं टिकटों के ऐलान होने के बाद बागी नेताओं को मनाने के साथ मुख्यमंत्री हर उस जिले में पहुंच कर सभा कर रहे हैं, जहां पार्टी की स्थिति सही नहीं बताई जा रही है। 
 
दूसरी ओर इस बार शिवराज सिंह के साथ संगठन स्तर पर नई टीम काम कर रही है। 2008 और 2013 विधानसभा चुनाव में जहां शिवराज सिंह के साथी के तौर पर तेज तस्वीर संगठन मंत्री अरविंद मेनन और चुनाव में किस तरह वोटरों को अपनी तरह किया जाए यानी चुनावी कैंपेन गढ़ने में माहिर अनिल माधव दवे भी इस बार चुनाव में शिवराज के सारथी नहीं हैं। 2003 में दिग्विजय सिंह को मिस्टर बंटाधार के नाम से टारगेट करने का फैसला इसी तिकड़ी ने लिया था।
 
पिछले चुनाव में टिकट बंटने के बाद डैमेज कंट्रोल करने में जिस तरह संगठन मंत्री अरविंद मेनन अपनी भूमिका निभाते थे, वैसी किसी भी भूमिका में वर्तमान संगठन मंत्री सुहास भगत नहीं दिखाई दे रहे है। खुद शिवराज को बागी उम्मीदवारों को मनाने के लिए आगे आने पड़ा है। ऐसे में सवाल ये उठ रहा है कि कहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चुनावी रण में कांग्रेस के सामने अकेले तो नहीं पड़ गए है...और दिग्विजय सिंह का इशारा कुछ इसी तरफ तो नहीं है...
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