क्या सच में लोकसभा चुनाव तय करेंगे कमलनाथ सरकार का भविष्य?

भोपाल| विकास सिंह| Last Updated: बुधवार, 13 मार्च 2019 (17:59 IST)
भोपाल। मध्यप्रदेश में को लेकर एक बार फिर सियासत गर्मा गई है। की तारीखों के एलान होने के बाद भाजपा नेताओं ने फिर कमलनाथ सरकार के भविष्य को लेकर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

इस कड़ी में सबसे नया बयान पार्टी के प्रदेश प्रभारी और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्त्रबुद्धे ने दिया है। होशंगाबाद पहुंचे पार्टी के प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि प्रदेश में कमलनाथ सरकार कुछ ही महीनों की मेहमान है। मीडिया से बात में कमलनाथ सरकार ने कहा कि वो मानते हैं कि चंद महीनों का विषय है और कुछ ही महीनों में मध्यप्रदेश में भाजपा समर्थन हासिल करेगी।
बीजेपी की ओर से सबसे बड़े नेता के इस बयान के बाद सूबे की सियासत गर्मा गई है। इससे पहले ठीक लोकसभा चुनाव की तारीखों के एलान के बाद पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष जीतू जिराती ने ट्वीट करते हुए लिखा कि चलो किसान भाइयों करो म.प्र. का मुख्यमंत्री बदलने की तैयारी क्योंकि 2 लाख का कर्जा तो माफ़ हुआ नही है, लोकसभा चुनाव के बाद मप्र में होगा भाजपा का मुख्यमंत्री।

मध्यप्रदेश में दिसंबर में कमलनाथ सरकार बनने के बाद ही भाजपा लगातार कांग्रेस सरकार के भविष्य को लेकर सवाल उठा रही है। इसके पहले पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय भी सार्वजनिक कार्यक्रम में कह चुके हैं कि जिस दिन ऊपर से इशारा मिला कमलनाथ सरकार को गिरा देंगे। तो दूसरी ओर नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव की सरकार की स्थिरता पर गाहे-बगाहे सवाल उठाते रहे हैं।

लोकसभा चुनाव का कनेक्शन : कमलनाथ सरकार के भविष्य को लेकर नेताओं के लगातार बयान के बाद ये सवाल उठना लाजिमी है कि भाजपा के दावे में कोई सच्चाई है या भाजपा लोकसभा चुनाव के दौरान एक शिगूफा छोड़ रही है। वरिष्ठ
पत्रकार शिव अनुराग पटैरिया कहते हैं कि अगर आंकड़ों की नजर से देखा जाए तो मध्यप्रदेश में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीटों का अंतर अधिक नहीं है, ऐसे में अगर कांग्रेस को मध्यप्रदेश में अपनी सरकार बनाए रखनी है तो उसको लोकसभा चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करना होगा।
पटैरिया कहते हैं कि अगर लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सीटों की संख्या दो अंकों यानी करीब आधी से अधिक पहुंचती है तो कांग्रेस के लिए बड़ी राहत की बात होगी और कांग्रेस सरकार को मजबूती मिलेगी, वहीं केंद्र में अगर एक बार फिर चुनाव परिणाम भाजपा के पक्ष में आए तो कांग्रेस सरकार के लिए जरूर एक खतरे की घंटी हो सकती है।

भाजपा की कांग्रेस के खिलाफ मनोवैज्ञानिक लड़ाई : वहीं दूसरा सवाल ये भी उठ रहा कि भाजपा लोकसभा चुनाव के समय इस मुद्दे को क्यों उठा रही है? इस पर सियासत के जानकर इसे भाजपा की कांग्रेस पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की रणनीति बताते हैं। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक दिनेश गुप्ता इसे भाजपा की कांग्रेस के खिलाफ मनोवैज्ञानिक लड़ाई बताते हैं। गुप्ता कहते हैं कि विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं का जो मनोबल कम हुआ है, उसको बढ़ाने के लिए नेता इस तरह के बयानबाजी कर रहे हैं।

भाजपा जानती है कि अगर बूथ कार्यकर्ता लोकसभा चुनाव में सक्रिय नहीं रहा तो चुनाव परिणाम उसकी उम्मीद के विपरीत भी जा सकते हैं। इसके साथ ही गुप्ता कहते हैं कि भाजपा का ये दांव उसको उल्टा भी पड़ सकता है। वो कहते हैं कांग्रेस सरकार की कमान ऐसे वरिष्ठ नेता कमलनाथ के हाथ में है, जिनकी पहचान ही सियासी मैनेजमेंट के खिलाड़ी के तौर पर होती है। ऐसे में प्रदेश में तस्वीर भाजपा नेताओं के दावे के विपरीत भी हो सकती है।

सीटों का सियासी समीकरण : अगर बात मध्यप्रदेश में सीटों के सियासी समीकरण की करें तो लोकसभा चुनाव को लेकर इस वक्त जो सियासी समीकरण बनते हुए दिखाई दे रहे हैं उसे किसी भी तरह कांग्रेस के अनुकूल नहीं कहा जा सकता। बात करेंगे सदन के अंदर
संख्या बल की तो कांग्रेस के 114 विधायक हैं और सपा का एक, बीएसपी के दो विधायक और चार निर्दलीय विधायकों का समर्थन कमलनाथ सरकार के साथ है।
वहीं, मुख्य विपक्षी दल बीजेपी बहुमत के आंकड़ों से कुछ कदम दूरी पर 109 विधायकों के साथ सदन में मौजूद है। लोकसभा चुनाव को लेकर बसपा सुप्रीमो मायावती ने जिस तरह एलान किया कि कांग्रेस के साथ किसी भी राज्य में गठबंधन नहीं होगा, ऐसे में इस बात पर भी सवाल उठने लगे कि मध्यप्रदेश में बसपा का समर्थन क्या लोकसभा चुनाव के बाद भी कांग्रेस को मिलता रहेगा। बसपा की विधायक रामाबाई अपने बयानों से कांग्रेस सरकार के खिलाफ अपनी नाराजगी दिखाती रही हैं, वहीं निर्दलीय विधायक भी सरकार को आंख दिखाते रहे हैं।


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