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बाल कविता : हंसो-मुस्कुराओ...

Updated: सोमवार, 23 अक्टूबर 2017 (14:19 IST)
बहुत देर चुप थे, जरा गुनगुनाओ,
अरे भाई थोड़ा हंसो-मुस्कुराओ।
 
लगातार पापा ये चुप्पी बुरी है,
ये हंसना-हंसाना असल जिंदगी है।
मुखड़े पर अपने सितारे सजाओ,
अरे भाई थोड़ा हंसो-मुस्कुराओ।
 
मम्मी भी गुमसुम हैं बैठी उदासी,
रखा ढेर पानी मगर फिर भी प्यासी।
उठो शीघ्र खुशियों की गंगा नहाओ,
अरे भाई थोड़ा हंसो-मुस्कुराओ।
 
ये मस्ती के बादल, ये खुशियों की बूंदें,
इन्हें गुदगुदाओ ये पलभर में चूं दें।
हैं सिर पर तुम्हारे पकड़ के तो लाओ,
अरे भाई थोड़ा हंसो-मुस्कुराओ।
 
पूजा के कमरे में घंटी की टुनटुन,
दादी का, दादा का कंचन है मन।
जरा उनसे जाकर दुआएं तो पाओ,
अरे भाई थोड़ा हंसो-मुस्कुराओ।
लेखक के बारे में
प्रभुदयाल श्रीवास्तव
12, शिवम सुंदरम नगर, छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश (Mo.-+919131442512).... और पढ़ें

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