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इंदौर में तीसरी नेशनल ऑप्टोमेट्री कॉन्फ्रेंस, 200 से ज्यादा ऑप्टोमेट्रिस्ट हुए शामिल
Optometry Conference in indore
नगर स्कूल ऑफ ऑप्टोमेट्री अहमदाबाद के वरिष्ठ लेक्चरर ऑप्टोमेट्रिस्ट अतानु सामंता ने कहा कि छोटी उम्र और किशोरावस्था में ही आंखों का कमजोर हो जाना आज के टाइम पर एक बड़ी समस्या है। एक वक्त पर जब आंखों की रोशनी सिर्फ बुजुर्गों में कम होती थी, लेकिन अब छोटे-छोटे बच्चे भी चश्मा लगाए हुए दिख जाते हैं।
इस कारण बच्चों की दृष्टि हो रही है कमजोर : आज के वक्त में ज्यादा स्क्रीन टाइम बिताना बच्चों में कमजोर दृष्टि का मुख्य कारण बन रहा है। उम्र 5 साल हो या 22 साल हर कोई अपने दिन के आधा से ज्यादा वक्त स्क्रीन टाइम पर बिता रहा है। फिर चाहे वो टीवी हो मोबाइल हो या फिर लैपटॉप। आंखों के लिए विटामिन और मिनरल्स बहुत जरूरी है। डाइट में इनकी कमी आंखों की समस्याएं उत्पन्न कर सकती हैं।
कब होती है विजय थैरेपी की जरूरत : विजन थैरेपी की जरूरत तब होती है जब मष्तिष्क में एक इमेज नहीं बन पाती एवं ड्यूल इमेज की समस्या होने लगती है। यह आँखों की मसल्स के लिए बेहद कारगर होती है।”
क्या होता है मायोपिया : चेन्नई से आए देश के नामचीन ऑप्टोमेट्रिस्ट डॉ. संजय मेहता ने चश्में की उपयोगिता को बताते हुए कहा कि जब दूर की चीजें कम या धुंधली नजर आती है तो इस स्थिति को मायोपिया कहते हैं। आईबॉल की लंबाई ज्यादा होने के कारण यह समस्या होती है।
माओपिया के लक्षणों में दूर की चीजें ठीक से नजर न आना, बच्चों का टीवी बहुत करीब जाकर देखना, सिर में बार बार दर्द, आंखों का सिकोड़कर देखना शामिल है। हाई मायोपिया के कारण देखने की क्षमता लगातार कम होने का खतरा होता है। इसके लिए माइनस पावर का चश्मा या कॉन्टेक्ट लेंस पहनने की सलाह दी जाती है।
भारती विद्यापीठ सांगली महाराष्ट्र में ऑप्टोमेट्री संकाय के विभागाध्यक्ष ऑप्टोमेट्रिस्ट अजित लिमये ने आँखों से जुड़े रोग ड्राई आई की जानकारी देते हुए कहा कि आंख की कई ऐसी बीमारियां हैं जो कि जन्म से होती हैं या जन्म के कुछ वक्त बाद होती हैं, इसी में से एक बीमारी 'लो विजन' या 'अल्प दृष्टि' है।
कुछ लोगों को रात में न दिखाई देने की बीमारी होती है। इसे लो लाइट विजन कहा जाता है। ये बीमारी जन्मजात होती । कुछ मानसिक विकार या आनुवांशिक विसंगतियां भी लो विजन की वजह होती हैं। लो विजन एक ऐसी समस्या है, जिसमें देखना मुश्किल हो जाता है। चश्मे, कान्टैक्ट लेंस या किसी अन्य सर्जिकल विधि की मदद से ठीक नहीं किया जा सकता है।
लो विजन के मरीजों को परंपरागत चश्मे से दिखाई नहीं देता है। इसके लिए ओमेगा-3 फैटी एसिड्स, जिंक, विटामिन सी, ई से भरपूर चीजों के सेवन से काफी हद तक कमजोर नजर से बचा जा सकता है। आंखों की सेहत के लिए नियमित रूप से व्यायाम करना भी बहुत जरूरी माना जाता है। संतुलित आहार आंखों को लंबी उम्र तक स्वस्थ रखने के लिए बहुत जरूरी है।
मधुमेह का कितना प्रभाव : बैंगलोर से आई ऑप्टोमेट्री काउंसिल ऑफ इंडिया की सीओओ ऑप्टोमेट्रिस्ट पॉला मुखर्जी ने बताया कि मधुमेह का भी आँखों पर गंभीर एवं नकारात्मंक प्रभाव पड़ता हैl मरीजों को प्रत्येक छः माह में रेटिना की जांच अवश्य करवानी चाहिए। इस जांच में ऑप्टोमेट्रिस्ट की भूमिका मत्वपूर्ण होती है।
बदलती लाइफ स्टाइल से टाइप टू डायबिटिज़ के ज्यादा मामले सामने आ रहे है। होता है उन्हें वर्ष में एक इस कांफ्रेस के माध्यम से हमारे द्वारा ऑप्टोमेट्रिस्ट डायबिटिक रेटिनोपैथी की स्क्रीनिंग कैसे करें और उसमे क्या क्या सावधानी रखी जाए इस पर चर्चा की गई है।
यह जानकारी किसी ऑप्टोमेट्रिस्ट के लिए डायबिटिक रेटिनोपेथी से होने वाले अंधेपन को रोकने के लिए महत्वपूर्ण होगी। इसके अलावा नेत्र रोगों परिक्षण एवं निदान में पर्याप्त जानकारी साथ ही अपनी प्रैक्टिस को आधुनिक संसाधनों के साथ अपग्रेड करने की भी उन्हें ट्रेनिंग दी है, ताकि मरीजों को इसका लाभ मिल सके।”
दृष्टि से जुड़े रोग, सावधानियां एवं उपचार को लेकर जागरूकता फैलाने बढ़ाने के उद्देश्य से की जा रही इस कांफ्रेंस में इंदौर डिविजनल ऑप्टोमेट्रिस्ट ब्लाइंड वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष ऑप्टोमेट्रिस्ट शैलेन्द्र वैष्णव, सचिव ऑप्टोमेट्रिस्ट धर्मेन्द्र आनिया एवं प्रवक्ता गजराज सिंह पवार समेत देश भर से आए ऑप्टोमेट्रिस्ट मौजूद थे।
कॉन्फेंस में जन जागरण के उद्देश्य से एक स्मारक पत्रिका "दृष्टि मंथन" का विमोचन किया गया, जो नेत्र दोषों पर जागरूकता एवं इससे जुड़ी भ्रांतियों पर सटीक जानकारी प्रदान करेगी।
इस अवसर पर वरिष्ठ ऑप्टोमेट्रिस्ट हेमंत रत्न पारखी को ऑप्टोमेट्री के क्षेत्र अभूतपूर्व कार्यों के लिए लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया।
