इंदौर भीषण पानी के संकट से जूझ रहा है। कई गली मोहल्लों और इलाकों में पानी नहीं मिल रहा है। लोग बूंद- बूंद के लिए तरस रहे हैं। निगम के टैंकर पानी लोगों तक पहुंचा नहीं पा रहे हैं, वहीं निजी टैंकरों ने मनमानी शुरू कर दी है। ऐसे में इंदौर के परंपरागत पानी के स्त्रोत के बारे में भी चर्चा हो रही है। ज्यादातर तालाबों को बर्बाद कर दिया गया है या उनकी जमीनों पर कब्जे हो चुके हैं। जिससे शहर का वॉटर लेवल कम हो चुका है। हालत यह है कि अब तक नर्मदा के तीन चरणों के बाद भी शहर प्यासा है। अब नर्मदा के चौथे चरण लाने की योजना है, सवाल यह है कि शहर के पारंपरिक स्त्रोत को सूखाकर पूरी तरह से नर्मदा पर निर्भर होने से शहर का जल संकट दूर हो जाएगा।
बता दें कि पिछले कुछ दिनों में शहर के कुएं-बावडिय़ों के साथ ही यहां के तालाब भी खत्म होने लगे हैं या उन पर आसपास लोगों ने कब्जे जमा लिए है, जिससे ज्यादातर तालाब सूख चुके हैं या सूखने की कगार पर हैं, इससे इंदौर का भू-जल स्तर यानी वॉटर लेवल तेजी से गिरा है और इस साल शहर में जल के संकट ने विकराल रूप ले लिया है।
700 एकड़ जमीनें गायब: बता दें कि शहर में कई कुएं-बावडिय़ों को बंद कर ऊपर मल्टियां बना दी, तो कॉलोनियां भी कट गई। अब यही स्थिति तालाबों के कैचमेंट एरिया पर अवैध कब्जों और अतिक्रमण के चलते हुई है। लगभग ढाई हजार एकड़ तालाबों की जमीनों में से 700 एकड़ जमीनें गायब हो गई।
क्या चौथा चरण दूर करेगा जल संकट : नगर निगम के कर्णधार सिर्फ नर्मदा के भरोसे ही रहते हैं। तीन चरणों के बाद अब डेढ़ हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि खर्च कर चौथा चरण लाने का दावा किया जा रहा है। इसमें दावा किया गया कि इंदौर का जलसंकट दूर हो जाएगा। जबकि हकीकत यह है कि तेजी से चारों तरफ बढ़ रहे इंदौर की आबादी 50 लाख पार की है और नर्मदा का पानी कम मिलता ही है, वहीं बोरिंग भी तेजी से सूखने लगे। वैसे भी लगभग आधी आबादी बोरिंगों पर ही निर्भर है। अभी चूंकि अधिकांश बोरिंग बंद हो गए, जिससे पूरी निर्भरता नर्मदा पर आ गई और शहरभर में जलसंकट को लेकर त्राहिमाम् मचा है। यहां तक कि प्रमुख तालाब भी या तो सुख गए या उनमें आधा पानी ही फिलहाल बचा है।
खतरे में तालाब, कब्जे हुए, कॉलोनी कटी : इतना ही नहीं, बिलावली, सुख निवास सहित अन्य तालाबों की जमीनें ही कम हो गई और लगभग 700 एकड़ में अतिक्रमण और अवैध कब्जे हो गए, जहां कॉलोनी कट गई। मैरिज गार्डन, बिल्डिंगें-मल्टियां तन गई। यहां तक कि बायपास के आसपास दो दर्जन तालाब रिकॉर्ड में बताए जाते हैं। इनमें से भी आधा दर्जन से अधिक तालाब गायब हो गए। इन पर सडक़ों से लेकर अन्य निर्माण हो गए। वहीं अन्य तालाब भी खतरे की कगार पर हैं। हर साल गर्मियों में इन तालाबों की गाद निकालने, चैनलों की सफाई करने का अभियान भी चलता है। कल भी कलेक्टर शिवम वर्मा और निगमायुक्त क्षितिज सिंघल सिरपुर और लिम्बोदी तालाब का अवलोकन करने पहुंचे और जल गंगा संवर्धन अभियान के तहत चल रहे संरक्षण और विकास कार्यों को देखा। निगमायुक्त ने जिन चैनलों की सफाई के निर्देश दिए उनमें केलोद करताल चैनल, मोरोद माचला चैनल, निपानिया तालाब चैनल, भंवरासाला तालाब चैनल सफाई का कार्य पूर्ण, रेवती रेंज चैनल, राव बिलावली चैनल, ओएस्टर से लिंबोदी तालाब, सिरपुर तालाब कैट से आने वाली चैनल, सेज यूनिवर्सिटी के सामने बिलावली तालाब की चैनल, ओमेक्स हील्स से निकलने वाली बिलावली तालाब की चैनल शामिल है।
तालाबों को बर्बाद करने से आया संकट : शहर के आसपास कई तालाब हैं, लेकिन इन तालाबों की लगातार उपेक्षा की गई। कहीं अतिक्रमण हो गया तो कहीं पानी चोरी हो रहा है। इसके साथ ही नर्मदा परियोजनाओं के बाद तालाबों की क्षमता बढ़ाने पर ध्यान नहीं दिया गया। इसके बजाय उनके कैचमेंट एरिया में अतिक्रमण बढ़ गए। परिणामस्वरूप अब बारिश में भी तालाब पूरी तरह नहीं भर पाते और गर्मियों में सूख जाते हैं। इससे भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और बोरिंग सूखने लगे हैं।
यशवंत सागर से 35 एमएलडी : यशवंत सागर की संग्रहण क्षमता बढ़ाई गई, लेकिन उससे जलापूर्ति क्षमता नहीं बढ़ सकी। वर्तमान में यहां से लगभग 35 एमएलडी पानी लिया जा रहा है। यदि इसकी आपूर्ति क्षमता बढ़ाई जाए और इसे नर्मदा-गंभीर लिंक परियोजना से जोड़ा जाए, तो शहर के पश्चिमी हिस्से में पानी की समस्या काफी हद तक समाप्त हो सकती है। साथ ही शहर में वॉटर रिचार्जिंग को लेकर पर्याप्त जागरूकता नहीं है। नगर निगम ने भी बड़े स्तर पर रिचार्जिंग स्पॉट विकसित नहीं किए हैं।
48 वर्षों में नर्मदा के तीन चरण : 70 के दशक में इंदौर में सूखे जैसे हालात बन गए थे। तब शहर में नर्मदा का पानी लाने के लिए बड़ा आंदोलन हुआ। करीब एक माह तक चले आंदोलन के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने नर्मदा परियोजना को मंजूरी दी।
तब से अब तक क्या क्या हुआ?
पहला चरण : पहला चरण वर्ष 1978 में शुरू हुआ, जिसमें 90 एमएलडी (मिलियन लीटर प्रतिदिन) पानी इंदौर लाया गया।
दूसरा चरण : दूसरा चरण वर्ष 1990 में शुरू हुआ और इसमें भी 90 एमएलडी पानी जोड़ा गया।
तीसरा चरण : बढ़ती आबादी को देखते हुए तीसरे चरण की जरूरत महसूस हुई। वर्ष 2014 में शुरू हुए तीसरे चरण के तहत 360 एमएलडी पानी शहर को मिलने लगा।
75 लाख आबादी के हिसाब से होगा प्लान : चरण लगभग 25 लाख आबादी की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था, लेकिन बाद में 29 गांव नगर निगम सीमा में शामिल कर लिए गए। वहां भी नर्मदा लाइन बिछाने की जिम्मेदारी निगम पर आ गई। अब शहर की आबादी 35 लाख से अधिक हो चुकी है। इसी को देखते हुए नगर निगम अब चौथे चरण की योजना लगभग 75 लाख आबादी की जरूरतों के अनुसार बना रहा है। इस परियोजना पर लगभग 2200 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे।
रिपोर्ट : नवीन रांगियाल