राममनोहर लोहिया की राय

धर्म... लंबे पैमाने की राजनीति, राजनीति... छोटे पैमाने का धर्म

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मजहब और सियासत का रिश्ता ठीक तरह से अभी तक समझा नहीं गया है। हमारी बिरादरी ने भी नहीं समझा। मैं तो, साफ बात है, खुदा और ईश्वर के मामले में थोड़ा-सा कमजोर आदमी हूँ। शायद, उन लोगों ने भी उसे नहीं समझा जो खुदा और ईश्वर को बहुत अहमियत देते हैं। असलमें इन दोनों का रिश्ता है। खाली हमारी तरफ से जब यह कह दिया जाता है कि समाज और राज से मजहब का कोई ताल्लुक नहीं रहना चाहिए तो यह बात पूरी नहीं हो जाती।

पूरी बात करने के लिए अब यह समझना होगा कि धर्म तो है लम्बे पैमाने की राजनीति और राजनीति है छोटे पैमाने का धर्म। इनको और ज्यादा सोचें तो इस तरह से चलेगा कि मजहब का काम है अच्छाई को करे और राजनीति का काम है बुराई से लड़े। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन फर्क कभी भूल नहीं जाना चाहिए कि एक बुराई से लड़ता है, एक अच्छाई को करता है। दोनों को अगर एक-दूसरे के लिए हमदर्दी हो, प्रेम हो तो मामला अच्छा चल जाएगा। लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज दोनों में बहुत खींचातानी है।

इसीलिए मजहब जब सिर्फ अच्छाई करने बैठ जाता है तो कुछ-कुछ बेजान हो जाता है, क्योंकि बुराई से वह लड़ता नहीं और बुराई से लड़ते-लड़ते सियासत जब बिलकुल बुराई की लड़ाई में फँस जाती है, तो वह कुछ कलही हो जाती है। सुलह फिर उसमें नहीं रहती, कलह आजाती है। आज की सियासत में कलह आ गई है और आज के मजहब में एक सुस्ती या मुर्दनी आ गई है। अब दोनों अपने को सुधारें।

अभी तक मजहब वालों ने जो तरीके अख्तियार किए हैं, उनमें से कोई भी मुझे पसंद नहीं आया। मैं समझता हूँ मस्जिद, मंदिर अपने रखो। कोई भी उसमें दखल देने जाए तो मुझ जैसा समाजवादी कहेगा कि उस दखल देने वाले को हम रोकेंगे और ताकत से रोकेंगे। लेकिन ठोसबात कहने के लिए एक मिसाल देता हूँ। आज का हिन्दुस्तान कैसा खिचड़ी बन गया है। मजहब तो रूहानी चीज है, तो रूह की बात है, तो उसको दिमाग में रखो। लेकिन, यहाँ किसी की शक्ल देख लोगे तो कह दोगे कि वह कौन है, हिन्दू है या मुसलमान, यह तो कह ही दोगे। यहाँ तक भी कह दोगे कि कौन किस जाति का है, कौन किस सूबे का है।
कोई जरा अच्छा कपड़ा पहने हुए है तो उससे डर, कोई अँगरेजी बोलता है तो उससे डर, अँग्रेज से डर, गोरे से डर, सबसे डर। अब धीरे-धीरे जनता निडर हो रही है, बहुत धीरे-धीरे। और यही हिन्दुस्तान में एक नया रुझान अच्छा आ रहा है।







काहे की ये खाक, पत्थर की 'नेशनल इंटीग्रेशन' राष्ट्रीय ऐके की बात हो रही है। असल में बाहरी शक्ल तो कमअजकम एक जैसी होनी चाहिए और इसकी कोशिश होनी चाहिए कि बाहरी शकल से तो कमअजकम पता न चले कि कौन हिन्दू है, कौन मुसलमान है।

आजकल ये अणु बम और हाइड्रोजन बम वगैरह को जहाँ-तहाँ फोड़ते हैं और उसी को लेकर सबसे ज्यादा झगड़ा चल रहा है। मैं नए रुजहान वालों को क्या कहूँ? ये महात्मा गाँधी के चेले? चेला तो वैसे मैं भी हूँ, लेकिन मैं वह चेला नहीं हूँ, जो सरकार के साथ जुड़ गया है

र, गाँधीजी के चेले ज्यादातर तो क्या, करीब-करीब सभी सरकार के साथ, कम या ज्यादा जुड़े हैं, मंत्री बनकर न सही, लेकिन पुजारी बनके। मंत्री बनकर ज्यादा अच्छी तरह जुड़ा जा सकता है। खैर, अब ये लोग गाँधीवाद को सारी दुनिया में फैलाना चाहते हैं, सिर्फ हिन्दुस्तान में नहीं फैलाना चाहते! उनका कहना है कि यहाँ नाइंसाफी से मत लड़ो, वह जो अणु बम और हाइड्रोजन बम की नाइंसाफी है, इससे लड़ने चलो, वाशिंगटन चलो, मास्को चलो और कि अपने यहाँ आजादी है इसलिए यहाँ थोड़े ही सत्याग्रह करना है वगैरह-वगैरह

यहाँ ये गाँधीवादी लोग जो-जो कर रहे हैं, उसे छोड़ें और रूस और अमेरिका पर नजर डालें कि अगर रूस और अमेरिका इन हथियारों को खत्म नहीं करेंगे तो क्या नतीजा होगा? कब तक इन हथियारों को बनाते-बढ़ाते रहेंगे? रूस और अमेरिका के दुकानदार, मजदूर, किसान, पढ़े-लिखे लोग, नेता भी घबरा जाएँगे कि इन निकम्मी चीजों को हम कब तक जमा करते रहेंगे। अगले बीस-तीस बरस के अंदर यह फैसला होने वाला है कि या तो दुनिया से हथियार खतम होते हैं या दुनिया खतम होती है। इसमें कोई शक नहीं।

ब, हथियार कैसे खतम होंगे? मुझे खुद बहुत मुश्किल मालूम होता है। बड़े हथियार, मान लो खतम कर दिए जाएँ, तो छोटे कैसे खतम होंगे? क्योंकि छोटे हथियार खतम होने का मतलब है, पूरी तरह से नाइंसाफी खतम होना। वहीं मुझको थोड़ी आशा दिखाई देती है कि हथियार पूरी तरह से तब खतम होते हैं, जब नाइंसाफी खतम होगी। अबकी दफे, क्योंकि सब नाइंसाफियों के खिलाफ आदमी एक साथ उठ खड़ा हुआ है, ये नाइंसाफियाँ भी खतम हों और शायद इस बीसवीं सदी के खतम होने तक एक अच्छी दुनिया बने।

र, आज हिन्दुस्तान में सिर्फ एक ही आदमी तो सोचता है! बाकी सब उसकी बात को दुहराते हैं, बकते हैं। मेरा बस चलता तो उनको किसी तरह से ठोक-ठाक करके यह बात समझाता। खैर, मैं तो क्या समझाऊँगा, मामला तो बहुत बिगड़ चुका है। लेकिन ऐसे लोग उन्हें जाकर समझाएँ, जिन्हें हिन्दुस्तान में अच्छी चीजें दिखाई पड़ी हैं, जैसे तालिब इल्मों की तायदाद बढ़ती नजर आ रही है। कभी आपने इस पर गौर किया कि बाकी दुनिया में क्या हो रहा है? तरक्की का मतलब सिर्फ यही हुआ करता है क्या कि हम पुरानी हालत के मुकाबले में कितना आगे बढ़े? थोड़ा बहुत तो बढ़ेंगे ही। जैसे-जैसे जमाना बढ़ता है, वैसे-वैसे थोड़ी बहुत तरक्की होगी। आबादी बढ़ती है, इसलिए मकानों की तायदाद बढ़ेगी, तो यह कह दोगे कि तरक्की हो रही है? अपनी पुरानी हालत के मुकाबले में तरक्की तो होगी ही।

सियासी और समाजी मामले में सब चीजों की तरफ ध्यान देना होगा। सिर्फ एक चीज की तरफ ध्यान देने से कुछ नहीं होता। शायद मजहब में होता होगा कि एक के साधे सब सधे और सब साधे सब जाएँ, एक खुदा को पकड़ो, एक ईश्वर को पकड़ो। लेकिन सियासत में और खेती-कारखानों के मामलों में एक को पकड़ के बैठ जाओगे तो खतम हो जाओगे। सबको पकड़ो। और प्रधानमंत्री ने यही गलती की कि पंचवर्षीय योजना को पकड़ो और बकाया सब छोड़ो। जहन्नुम में सब चीजें चली जा रही हैं। पंचवर्षीय योजना भी खतम होती चली जा रही है। हम आगे तरक्की कर नहीं पा रहे हैं। असल में यह तो बुरी चीज हुई।

अच्छी चीज जो हिन्दुस्तान में हो रही है, वह यह कि हमारे अंदर से डर धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे कम हो रहा है। जब मैं 'हमारे' कहता हूँ तो मेरा मतलब सिर्फ बड़े लोगों से नहीं है। ऐसे लोग हैं, जो जनता को जाहिल समझते हैं जबकि प्रायः पढ़े-लिखे लोग ही जाहिल हुआ करते हैं। अभी जो मैंने कहा है उससे इतना तो शायद साबित हुआ होगा कि हम लोग कितना पुराना-नया कूड़ा मिलाकर कैसा जहर पैदा करते हैं। मैं मानता हूँ कि हिन्दुस्तान की जनता इस वक्त बहुत गिरी हुई है, दिमागी और जिस्मानी, दोनों हालत में। लेकिन जब यह ऊँचा उठेगी,तभी तो हिन्दुस्तान बन पाएगा। इधर बहुत बरसों से हिन्दुस्तान के साधारण आदमी में डर बहुत घुस गया है। हर चीज से वह डर गया है।

कोई जरा अच्छा कपड़ा पहने हुए है तो उससे डर, कोई अँगरेजी बोलता है तो उससे डर, अँग्रेज से डर, गोरे से डर, सबसे डर। अब धीरे-धीरे जनता निडर हो रही है, बहुत धीरे-धीरे। और यही हिन्दुस्तान में एक नया रुझान अच्छा आ रहा है। इसमें अगर कुछ खराबी भी आ जाए लेकिन निडराई आ जाए तो बहुत अच्छा होगा।

मैं इसको पसंद करूँगा। इसलिए हिन्दू-मुसलमान के मामले में मैं बराबर यही कहा करता हूँ कि मुसलमानों को हिन्दुस्तान में अगर डराकर रखना चाहते हो तो अच्छा नहीं होगा। घर में डरे हुए आदमी को कभी मत रखो, बड़ा खतरनाक हुआ करता है। डर बहुत खतरनाक चीज है, डर घर को तबाह किया करता है। वह डर धीरे-धीरे कम हो रहा है, बहुत धीरे-धीरे। अफसोस यही है कि पूरा डर खतम होने में शायद अभी 30-40 बरस और लगे। लेकिन, हम निडर बनते जा रहे हैं। यही हिन्दुस्तान का एक बढ़िया रुझान है



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