19 जनवरी को है ओशो रजनीश का निर्वाण दिवस, जानिए क्या होता है निर्वाण

पुनः संशोधित शनिवार, 15 जनवरी 2022 (15:24 IST)
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19 January : का जन्म 11 दिसंबर 1931 को कुचवाड़ा गांव, बरेली तहसील, जिला रायसेन, राज्य मध्यप्रदेश में हुआ था। उन्हें जबलपुर में 21 वर्ष की आयु में 21 मार्च 1953 मौलश्री वृक्ष के नीचे संबोधि की प्राप्ति हुई। 19 जनवरी 1990 को पूना स्थित अपने आश्रम में सायं 5 बजे के लगभग अपनी देह त्याग दी। उनका जन्म नाम चंद्रमोहन जैन था। उनकी समाधि पर लिखा है- ''न जन्में न मरे- सिर्फ 11 दिसंबर, 1931 और 19 जनवरी, 1990 के बीच इस ग्रह पृथ्वी का दौरा किया।'

जन्म : ओशो रजनीश का जन्म 11 दिसम्बर, 1931 को कुचवाड़ा गांव, बरेली तहसील, जिला रायसेन, राज्य मध्यप्रदेश में हुआ था। बचपन गाडरवारा में बीता और उच्च शिक्षा जबलपुर में हुई। जन्म के समय उनका नाम चंद्रमोहन जैन था। वे अपनी नाना नानी के पास ही रहते थे। उनका बचपन वहीं गुजरा। ओशो ने अपनी प्रवचन माला ‘ग्लिप्सेंस ऑफड माई गोल्डन चाइल्डहुड’ उनके जन्म और बचपन के रहस्य से पर्दा उठाया है। ओशो रजनीश के तीन गुरु थे। मग्गा बाबा, पागल बाबा और मस्तो बाबा। इन तीनों ने ही रजनीश को आध्‍यात्म की ओर मोड़ा, जिसके चलते उन्हें उनके पिछले जन्म की याद भी आई।


क्या होती है संबोधि : संबोधि शब्द बौद्ध धर्म का है। इसे बुद्धत्व (Enlightenment) भी कहा जा सकता है। देखा जाए तो यह मोक्ष या मुक्ति की शुरुआत है। फाइनल बाइएटिट्यूड या सेल्वेशन (final beatitude or salvation) तो शरीर छूटने के बाद ही मिलता है। हालाँकि भारत में ऐसे भी कई योगी हुए है जिन्होंने सब कुछ शरीर में रहकर ही पा लिया है। फिर भी होशपूर्ण सिर्फ 'शुद्ध प्रकाश' रह जाना बहुत बड़ी घटना है। होशपूर्वक जीने से ही प्रकाश बढ़ता है और फिर हम प्रकाश रहकर सब कुछ जान और समझ सकते हैं।

संबोधि निर्विचार दशा है। इसे योग में सम्प्रज्ञात समाधि का प्रथम स्तर कहा गया है। इस दशा में व्यक्ति का चित्त स्थिर रहता है। शरीर से उसका संबंध टूट जाता है। फिर भी वह इच्छानुसार शरीर में ही रहता है। यह कैवल्य, मोक्ष या निर्वाण से पूर्व की अवस्‍था मानी गई है। लगातार श्वास प्रश्वास पर ही ध्यान देते रहने या साक्षी भाव में रहने से यह घटित हो जाती है।

निर्वाण : ओशो 1987 में पूना के अपने आश्रम में लौट आए। वह 10 अप्रैल 1989 तक 10,000 शिष्यों को प्रवचन देते रहे। कहा जाता है कि अमेरिका के द्वारा दिए गए जहर का असर यूं तो 6 माह में ही दिखाई देने लगा था परंतु ओशो ने अपने शरीर को लगभग 5 वर्ष तक जिंदा रखा। इस दौरान वे बहुत ही कमजोर हो गए थे। उनके सभी अंगों ने काम करना बंद कर दिया था। अंतत: 19 जनवरी, वर्ष 1990 में ओशो रजनीश ने हार्ट अटैक की वजह से अपनी अंतिम सांस ली। कहा जाता है कि अमेरिकी जेल में रहते हुए उन्हें थैलिसियम का इंजेक्शन दिया गया और उन्हें रेडियोधर्मी तरंगों से लैस चटाई पर सुलाया गया जिसकी वजह से धीरे-धीरे ही सही वे मृत्यु के नजदीक जाते रहे। सुप्रसिद्ध लेखिका 'सू एपलटन' ने अपनी पुस्तक 'दिया अमृत, पाया जहर' में अमेरिका की रोनाल्ड रीगन सरकार द्वारा ओशो को थैलिसियम नामक जहर दिए जाने की घटना का शोधपूर्ण व रोमांचक विवरण प्रस्तुत किया है।

ओशो ने मृत्यु के कुछ दिनों पूर्व ही कहा था कि मेरा कार्य पूरा हो चुका है। मैं दुनिया को जो करके दिखाना चाहता था, वह मैंने दिखा दिया है। मेरे विचार और मेरे संदेश को दूर दूर तक फैलना है। मेरे स्वप्न अब मैं तुम्हें सौपता हूं....। देखना सपना कहीं सपना ही ना रह जाए।

: निर्वाण का अर्थ बुझना, निश्‍चल, शांत, स्थितप्रज्ञ, शून्य, बिना बाण का या मुक्ति होता है। इस शब्द का उपयोग ऐसे व्यक्ति के लिए करते हैं जिसने संबोधि प्राप्त की हो और जो अपनी इच्छा से अब शरीर छोड़ना चाहता हो। इसे पीड़ा या दु:ख से मुक्ति भी कहते हैं। इस शब्द का प्रचलन श्रमण परंपरा में है। हालांकि संबोधी के बाद देह में रहते हुए कि यदि कोई निर्वाण की अवस्था प्राप्त कर लेता हैं और जब वह एक लंबे समय बाद शरीर छोड़ता है तो उसके शरीर छोड़ने को महापरिनिर्वाण कहा जाता है। फिर भी इस संबंध में विद्वानों में मतभेद है। दरअसल यह समाधि की एक अवस्था होती है। इसका शरीर छोड़ने या नहीं छोड़ने से कोई संबंध नहीं होता है। बौद्ध धर्म में जरा, जन्म और मृत्यु आदि तरह के दु:ख से पूरी तरह से छुटकारे का नाम है निर्वाण।



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