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Sant Kabir: अनपढ़ थे कबीर, फिर कैसे डिगा दी बड़े-बड़े पंडितों की गद्दी? सिकंदर लोदी भी टेक चुका था घुटने!
Kabir Jayanti: कवि संत कबीर दास जी की जयंती हर साल ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। इस साल यह शुभ तिथि 29 जून 2026 (सोमवार) को पड़ रही है। आज से सदियों पहले, जब समाज जात-पांत, छुआछूत, पाखंड और सांप्रदायिकता के दलदल में धंसा हुआ था, तब एक ऐसी आवाज़ उठी जिसने व्यवस्था की जड़ों को हिलाकर रख दिया। वह आवाज़ किसी राजा या बड़े पंडित की नहीं, बल्कि काशी के जुलाहे कबीर दास की थी। कबीर सिर्फ एक संत नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास के पहले ऐसे 'क्रांतिकारी' थे जिन्होंने धर्म के ठेकेदारों को सरेआम चुनौती दी।
आइए जानते हैं क्रांतिकारी संत कबीर की अनसुनी दास्तान...
लहरतारा से जुलाहे के घर तक का सफर
कहा जाता है कि काशी के लहरतारा तालाब में एक नवजात शिशु तैरता हुआ मिला था। नीरू और नीमा नाम के एक गरीब और वंचित मुस्लिम जुलाहा दंपत्ति ने उस बच्चे को अपनाया और नाम रखा- कबीर। कबीर ने खुद लिखा कि उन्होंने कभी कागज या कलम को हाथ नहीं लगाया, लेकिन समाज को देखकर उन्होंने जो कड़वे और प्रामाणिक अनुभव कहे, उन्हें सुनकर बड़ी-बड़ी पोथियां रटने वाले विद्वान भी बगलें झांकने लगे।
जब सिकंदर लोदी के सामने नहीं झुका कबीर का 'एटीट्यूड'
कबीर की खरी-खरी बातों से जब पंडितों और मौलवियों की 'दुकानें' बंद होने लगीं, तो दोनों ने मिलकर दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोदी से शिकायत कर दी। कबीर को दरबार में हाजिर किया गया और सुल्तान को सलाम करने को कहा गया।
कबीर का जवाब इतिहास में दर्ज हो गया- उन्होंने कहा:
'मैं सिर्फ उस एक परमात्मा को सलाम करता हूं जिसने ब्रह्मांड बनाया है, मिट्टी से बने किसी इंसान को नहीं।'
नाराज सुल्तान ने कबीर को हाथी के पैरों तले कुचलवाने और जंजीरों में बांधकर गंगा में डुबाने जैसे कई मृत्युदंड दिए, लेकिन कबीर हर बार चमत्कारिक रूप से बच निकले। अंततः सिकंदर लोदी को उनके अलौकिक व्यक्तित्व के आगे घुटने टेकने पड़े।
गुरु रामानंद को जब कबीर ने दिखाया आईना
कबीर स्वामी रामानंद से दीक्षा लेना चाहते थे, लेकिन जुलाहा होने के कारण उन्हें पात्र नहीं माना गया। एक दिन जब कबीर का स्पर्श स्वामी रामानंद से हुआ, तो उन्होंने खुद को अपवित्र मानकर दोबारा गंगा स्नान करने की बात कही।
तब कबीर ने भावुक होकर एक गहरी बात कही:
'गुरुदेव, आपकी पवित्रता मुझे पावन न कर सकी, लेकिन मेरी अपावनता ने आपको दोबारा नहाने पर मजबूर कर दिया? सुना था देवताओं के छूने से पापी तर जाते हैं, आज एक देवता इंसान के छूने से अपवित्र हो गया!' इस सत्य ने रामानंद जी की आंखें खोल दीं और उन्होंने कबीर को तुरंत गले लगा लिया।
पाखंड पर करारी चोट और 'मजहब-ए-इंसानियत'
कबीर ने धर्म के नाम पर होने वाले हर दिखावे की धज्जियां उड़ाईं। उन्होंने हिंदुओं की मूर्ति पूजा को आड़े हाथों लिया, तो मुसलमानों की हिंसात्मक प्रवृत्ति और मस्जिद की बांग पर भी सवाल उठाए। उनका एक ही मूलमंत्र था-
'जाति-पांति पूछे नहिं कोई, हरि को भजै सो हरि को होई।'
स्वर्ग-नरक के अंधविश्वास को चुनौती: काशी छोड़ मगहर प्रस्थान
उस दौर में अंधविश्वास था कि काशी में मरने वाला सीधे स्वर्ग जाता है और मगहर में मरने वाला नरक। कबीर ने इस ढोंग को तोड़ने की ठानी। जीवन के आखिरी दिनों में उन्होंने अपने बेटे कमाल से कहा कि मुझे मगहर ले चलो। जब लोगों ने टोकते हुए कहा कि वहां तो नरक मिलेगा, तो कबीर हंसे और बोले-
'स्वर्ग और नरक केवल मन का भ्रम हैं। अगर मेरे कर्म पवित्र हैं, तो मैं मगहर में मरकर भी भगवान से अपना हक (स्वर्ग) छीन लूंगा।'
मौत के बाद भी एकता का संदेश: चादर उठाई तो मिले सिर्फ फूल!
कबीर ताउम्र हिंदू-मुस्लिम को एक करने में जुटे रहे और मौत के वक्त भी उन्होंने यही किया। जब मगहर में उन्होंने प्राण त्यागे, तो हिंदू उनका अंतिम संस्कार करना चाहते थे और मुस्लिम उन्हें दफनाना चाहते थे। दोनों आपस में लड़ने लगे।
लेकिन जैसे ही उनके शव से चादर हटाई गई, वहां कोई मृत शरीर नहीं था; वहां सिर्फ कुछ ताजे फूल बिखरे पड़े थे। दोनों धर्मों ने आधे-आधे फूल बांटे- हिंदुओं ने समाधि बनाई और मुसलमानों ने मज़ार। आज भी मगहर में ये दोनों अगल-बगल मौजूद हैं।
आज की सीख: कबीर आज भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका लिखा 'बीजक' और उनके दोहे आज भी समाज को आईना दिखा रहे हैं। उनका संदेश साफ था- धर्म दिल की कशिश और इंसानी भलाई में है, खोखले कर्मकांडों में नहीं।
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