आर्थिक क्षेत्र में रफ्तार के साथ संतुलन भी हो

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लाभ उठाने में मदद मिले। उदारीकरण के पक्ष और विपक्ष की बहस के बावजूद भारत में पिछले 18-20 वर्षों से प्रत्येक सरकार आर्थिक उदारीकरण और बाजारवादी सुधारों की नीतियाँ ही अपना रही है। ये नीतियाँ वर्तमान सरकार की देन नहीं है। अलबत्ता यह सरकार उदारीकरण की दिशा में कोई बड़ा कदम नहीं उठा सकी है। पर हम विश्व अर्थव्यवस्था से अपने को काट कर नहीं रख सकते। यही कारण है कि आज बहुत से साम्यवादी देशों में बाजारवादी नीतियाँ अपनाई जा रही हैं।

भारत एक बड़ा देश है। हमारी आबादी बड़ी है। हमारे प्राकृतिक संसाधन भी विशाल हैं। आजादी के साठ-इकसठ वर्षों में देश ने आर्थिक क्षेत्र में कई उपलब्धियाँ हासिल की हैं। बाजारवादी आर्थिक नीतियाँ अपनाने के बाद अब अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर भी आठ-नौ प्रतिशत वार्षिक पर है, जो उच्च वृद्धि दर मानी जाती है। पर हमारा यह आर्थिक विकास संतुलित नहीं है। इसे संतुलित बनाए रखने की बहुत जरूरत है। आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब भी गरीबी रेखा से नीचे है।

ऊँची ग्रोथ हासिल कर लेने के बावजूद देश में गरीबी रेखा के नीचे रह रहे लोगों को दो जून पेट भर भोजन नहीं मिल पाता। आर्थिक विकास को संतुलित बनाए रखने के लिए सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। शिक्षा का विस्तार करके लोगों को नए अवसरों के योग्य बनाया जा सकता है। तभी लोग गरीबी से उबर सकेंगे और विकास संतुलित बन सकेगा। हमारे देश की जो स्थिति है उसमें शिक्षा और स्वास्थ्य को बाजार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। उद्योग जगत सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र को खोलने की बात करता है। शिक्षा का क्षेत्र निजी निवेश के लिए खुला है। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में प्रायवेट सेक्टर के आने पर पाबंदी नहीं है।

प्रायवेट सेक्टर ने कुछेक विश्वविद्यालय भी खोले हैं लेकिन उच्च शिक्षा में निजी निवेश अब भी नहीं आ रहा है। इस संदर्भ में यह कहना भी जरूरी है कि भारत के लिए कृषि और कृषि संबंधित क्षेत्र का विकास भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। अब भी आबादी का बड़ा हिस्सा गाँवों में रहता है और खेतीबाड़ी तथा पशुपालन पर निर्भर है।

कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्र में जितना पूँजी और कौशल पहुँचना चाहिए वह पहुँच नहीं रहा। इसी कारण कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर निम्न स्तर पर बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वालों का आर्थिक जीवन और रहन-सहन सुधारना है तो कृषि क्षेत्र का विकास जरूरी है। इस काम के लिए नीतियों की कमी नहीं है पर उनका कारगर क्रियान्वयन एक बड़ी चुनौती है।
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- प्रो. बीबी भट्टाचार्य आज हम ऐसे दौर में पहुँच चुके हैं जहाँ पूरी दुनिया में बाजारवादी आर्थिक नीतियों का ही बोलबाला है। इस दौर में उदारीकरण या ग्लोबलाइजेशन से डरने से काम नहीं चलेगा। दुनिया जिस तरफ जा रही है उसकी अनदेखी करना भारत के लिए ठीक नहीं होगा। ऐसे में विकसित देशों या चीन की कंपनियों के भारतीय अर्थव्यवस्था पर छा जाने का हौवा खड़ा करने के कोई मायने नहीं हैं। डर से किए गए निर्णय ठीक नहीं होते।
हमें ऐसी नीतियाँ अपनानी चाहिए जिससे हमें दुनिया की नई परिस्थितियों का
(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के कुलपति हैं)



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