इस तरह हुआ चित्रकला का विकास

रेसीडेंसी की स्थापना के बाद ब्रिटिश सरकार के 'कल्चरल अटैची' का भी मुख्यालय इंदौर बनाया गया। उसके द्वारा व इंदौर में नियुक्त अन्य योरपीय अधिकारियों द्वारा महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) को योरपीय चित्र भेंट किए जाते थे। महाराजा ने भी उन्हें जब भारतीय शैली के चित्र भेंट करने चाहे तो महाराजा ने पाया कि नगर में कोई श्रेष्ठ चित्रकार न था।

1912 में जब इंदौर की कक्षाएं प्रारंभ होनी थीं, तब यह तय किया गया कि इस संस्था को आर्थिक अनुदान देने वाले राजा-महाराजाओं के चित्र बनवाकर संस्‍था में लगवाए जाएं। इस कार्य के लिए रॉयल एकेडमी ऑफ ब्रिटेन से एक कलाकार को आमंत्रित किया गया जिसने राजाओं के 'पोर्ट्रेट' बनाए। ये चित्र आज भी अद्वितीय व अनुपम हैं।
इंदौर के धनिक परिवारों में चित्रकला के प्रति लगाव बढ़ रहा था। प्रख्यात चित्रकारों के बनाए चित्र रखना प्रतिष्ठा का सूचक बन गया था।

ऐसे वातावरण में महाराजा ने इंदौर रामचंद्रराव प्रतापराव को विशेष संरक्षण व प्रोत्साहन दिया। महाराजा उन्हें अपने साथ कई मर्तबा योरप ले गए और वहां उन्हें विश्वविख्यात आर्ट गैलरियों में दिखलाया। महाराजा के प्रोत्साहन से रामचंद्रराव की तूलिका मुखरित हो उठी। प्रसिद्ध चित्रकार श्री डी.डी. देवलालीकर को भी महाराजा ने रामचंद्रराव के सान्निध्य में रखा।
धीरे-धीरे इंदौर के माध्यमिक व हाईस्कूलों के विद्यार्थियों में चित्रकला लोकप्रिय होने लगी। यहां के विद्यार्थियों को को 'आर्ट्स स्कूल ऑफ बॉम्बे' की प्रायमरी व इंटरमीडिएट परीक्षाओं में सम्मिलित करवाया जाता था। 1923 में प्रारंभिक व इंटर परीक्षा में यहां से क्रमश: 21 व 7 परीक्षार्थी सम्मिलित हुए जिनमें 10 व 5 सफल रहे। अगले वर्ष सर्वश्रेष्ठ छात्र के रूप में डी.डी. देवलालीकर को चुनकर बंबई उच्च अध्ययन हेतु भेजा गया।
इंदौर में 1926 में प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य की गई जिसमें ड्राइंग भी सम्मिलित थी। शिक्षकों को प्रशिक्षण देने के लिए पृथक कोर्स चलाया गया। इसी वर्ष श्री देवलालीकर के निर्देशन में 'चित्रकला प्रशिक्षण कक्षा' प्रारंभ हुई। चित्रकला का अध्यापन कराने वाले शिक्षकों को वेतन के अतिरिक्त पारिश्रमिक भी दिया जाने लगा।

श्री देवलालीकर व उनके तीन सहयोगी अध्यापकों की निष्ठा, लगन व परिश्रम फलीभूत हुई और नगर में चित्रकला के प्रति एक सम्मोहन-सा जाग उठा। इनमें से एक शिक्षक श्री रेगे ने 'एडवांस एक्जामिनेशन' पास कर अपने ज्ञान व अनुभव से छात्रों को लाभान्वित किया।
1930 में महाराजा यशवंतराव के जन्मदिवस पर एक चित्रकला प्रदर्शनी आयोजित की गई। इसके बाद तो हर वर्ष ही यह प्रदर्शनी लगने लगी। महाराजा, महारानी व राजपरिवार के सदस्य इस प्रदर्शनी में आते और श्रेष्ठ चित्रों को चुनकर पुरस्कृत करते थे। यह प्रदर्शनी नगर के व आसपास के धनिकों, कलाप्रेमियों व बुद्धिजीवियों के लिए आकर्षण का केंद्र बनती जा रही थी।
बहुत से योरपीय कलाप्रेमी भी यहां आते और अच्छी कीमतों पर चित्रों को खरीदते थे। बात 1933 की प्रदर्शनी की है, जब इंदौर स्थित पॉलिटिकल एजेंट सपत्नीक इस प्रदर्शनी में आए हुए थे। श्रीमती ग्लेन्सी एक चित्र पर मोहित ही हो गईं और उसे उन्होंने खरीदकर ही दम लिया। इस घटना के बाद प्रदर्शनी में आने वाले श्रेष्ठ चित्रों के लिए योरपीय व्यक्तियों द्वारा भी कुछ वार्षिक पुरस्कारों की घोषणा की गईथी।



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