sawan somwar

पर्यावरणीय नैतिकता और आपदा पर आधारित लघु कथा : अंतिम बीज

Updated: बुधवार, 21 मई 2025 (14:56 IST)
एक था गांव, जहां कभी हरियाली अपने चरम पर थी। नदियां कलकल करती बहती थीं, पेड़ फलों से लदे रहते थे। पर धीरे-धीरे लालच हावी होता गया। मनुष्यों ने अधिक फसल, अधिक धन के लिए जंगलों को काटना शुरू किया, नदियों को प्रदूषित किया। विकास की अंधी दौड़ में, पर्यावरणीय नैतिकता को ताक पर रख दिया गया।
 
एक दिन, प्रकृति ने अपना रौद्र रूप दिखाया। लगातार सूखा पड़ा, धरती फटने लगी और जो फसलें बची थीं, वे भी जहरीली हो गईं। लोग भुखमरी और बीमारी से मरने लगे। हर कोई बस एक ही चीज़ ढूंढ रहा था पानी, और शुद्ध भोजन।
 
गांव के एक कोने में, एक वृद्ध महिला, बूढ़ी 'माई' थी, ने अपने घर के पिछवाड़े में एक छोटा सा बगीचा संजो रखा था। उसने वर्षों से विभिन्न प्रकार के बीजों को सहेज कर रखा था, यह जानते हुए कि एक दिन उनकी आवश्यकता पड़ सकती है। जब सब कुछ नष्ट हो गया, बूढ़ी माई ने अपने पोते को बुलाया।
 
'देखो, बेटा,' उसने कहा, 'ये हमारे अंतिम बीज हैं। इन्हें ऐसी जगह बोना जहां कोई इन्हें छू न सके, और जब वर्षा हो, तो इन्हें जीवन देना।'
 
बूढ़ी माई ने उसे समझाया कि कैसे प्रकृति से लेना ही नहीं, उसे देना भी पड़ता है। कैसे हर पेड़, हर नदी का सम्मान करना चाहिए।
 
जब पहली बूंद गिरी, तो बच्चे ने माई की बात याद की। उसने सबसे ऊंची पहाड़ी पर जाकर वे बीज बो दिए। अगली सुबह, जब सूरज निकला, तो उस पहाड़ी पर एक छोटा सा हरा अंकुर फूट रहा था। 
 
वह गांव के लिए आशा की एक नई किरण थी। लोगों ने समझा कि प्रकृति का सम्मान ही उनके अस्तित्व का एकमात्र रास्ता है। धीरे-धीरे, उस एक अंकुर से प्रेरणा लेकर, लोगों ने फिर से धरती को हरा-भरा करना शुरू किया, और इस बार, वे प्रकृति के प्रति अधिक सचेत और नैतिक थे।

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लेखक के बारे में
सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक, गाडरवारा.... और पढ़ें

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