लेखन केवल कागज़ पर ही नहीं होता-तेजेन्द्र शर्मा

Tejendra
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कथाकार तेजेन्द्र शर्मा की साहित्यिक यात्रा और लेखन प्रक्रिया पर मधुलता अरोरा की बातची

जाने माने लेखक तेजेन्द्र शर्मा के अब तक चार कहानी संग्रह 'काला सागर', 'ढिबरी टाइट', 'देह की कीमत' और 'ये क्या हो गया ! 'प्रकाशित हो चुके हैं। उनका पाँचवाँ कहानी संग्रह प्रेस में है। उनका पहला कविता संग्रह 'यह घर तुम्हारा है' इसी महीने छप कर आया है।तेजेन्द्र शर्मा के संयोजन में ब्रिटेन के 25 कवियों का एक कविता संग्रह 'यहाँ से वहाँ तक' भी इसी वर्ष हिन्दी जगत तक पहुँचा है।

तेजेन्द्र शर्मा की कहानियों के तीन अनूदित कहानी संग्रह 'ढिबरी टाइट' (पंजाबी), 'पासर्पोट का रङहरू'(नेपाली) एवं 'ईंटों का जंगल' (उर्दू) प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी कहानियाँ देश विदेश की कई भाषाओं में अनूदित और संग्रहों में शामिल हैं। पहले मुंबई में और अब 8 बरस से लंदन में। हिन्दी कथा साहित्य के लिए एकमात्र अंतर्राष्ट्रीय सम्मान देने वाली संस्था 'कथा यू.के.' के संस्थापक, संचालक। पिछले बरसों में लिखी उनकी कहानियों में यूके के जनजीवन और परिवेश को बखूबी देखा जा सकता है। बीच-बीच में कविताएँ और ग़ज़लें भी।

मधु : आपके लिए लेखन क्या है?

तेजेन्द्र : लेखन मेरे लिए आवश्यकता भी है और मजबूरी भी। जब कभी ऐसा कुछ घटित होते देखता हूँ जो मेरे मन को आंदोलित करता है तो कलम स्वयमेव चलने लगती है। मेरे लिए लिखना कोई अय्याशी नहीं है, इसीलिए मैं लेखन केवल लेखन के लिए जैसी धारणा में विश्वास नहीं रखता। लिखने के पीछे कोई ठोस कारण और उद्देश्य होना आवश्यक है और न ही मैं स्वांतः सुखाय लेखन की बात समझ पाता हूँ।

मैं अपने लिखे हुए प्रत्येक शब्द के माध्यम से अपनी बात आम पाठक तक पहुँचाना चाहता हूँ। हाँ, यह सच है कि मैं हिंदी के मठाधीशों को प्रसन्न करने के लिए भी नहीं लिखता। मुझे एक अनजान पाठक का पत्र किसी बड़े आलोचक की शाबाशी के मुकाबले कहीं अधिक सुख देता है। मन में कहीं यह भी चाहत है कि हमारे वरिष्ठ लेखक जो एक महत्वपूर्ण लेखन की परंपरा कायम कर गए हैं, उसमें, चाहे छोटा सा ही सही, कुछ योगदान मेरा भी बन सके।

मधु : आपकी निगाह में लेखक एक आम आदमी से किस प्रकार भिन्न होता है?

तेजेन्द्र : मुझे लगता है कि परिष्कृत सोच एवम्‌ संवेदनशीलता एक लेखक को एक आम आदमी से अलग करती है। जहाँ आम आदमी समय के साथ-साथ उस घटना को भुला देता है, वहीं एक संवेदनशील लेखक उस घटना को अपने दिमाग में मथने देता है। समय के साथ-साथ वह घटना तो अवचेतन मन में चली जाती है, लेकिन एक रचना का जन्म हो जाता है।

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जहाँ आम आदमी अपने आप को केवल घटना तक सीमित रखता है, वहीं एक अच्छा लेखक उस घटना के पीछे की मारक स्थितियों की पड़ताल करता है और एक संवेदनशील रचना रचता है। अब देखिए, कनिष्क विमान की दुर्घटना एक आम आदमी को भी आंदोलित करती है और एक लेखक को भी। आम आदमी के लिए कुछ ही समय के पश्चात 329 केवल एक संख्या बन जाती है जबकि लेखक उस घटना से बार-बार गुज़रता है और अंततः एक रचना का जन्म हो जाता है।



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