थरथराता रहा धुआँ तन्हा
मीनाकुमारी
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दिल मिला है कहाँ-कहाँ तनहा
बुझ गई आस, छुप गया तारा
थरथराता रहा धुआँ तन्हा
जिन्दगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तनहा है और जाँ तन्हा
हमसफर कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हा
जलती-बुझती-सी रौशनी के परे
सिमटा-सिमटा सा इक मकाँ तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जाएँगे यह जहाँ तन्हा।

