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हिन्दी कविता : लानत है राष्ट्रविरोधी धंधों पर

Updated: सोमवार, 30 दिसंबर 2019 (14:19 IST)
यह सर्दी बरपा रही है कैसा कहर।
आलम को गिरफ्त में लिए है शीतलहर।
ठिठुरन के आगोश में हर बस्ती, गांव, शहर।
पारा और भी गिर-गिर जाता है शामो-सहर।।1।।
 
सूरज भी लुका-लुका है भरी दोपहर।
कम पड़ने लगे हैं सभी शालो-स्वेटर।।
पक्षी, पेड़, जीव सब सहमे-सहमे,
घनी बर्फबारियां हैं उधर पहाड़ों पर।।2।।
 
कश्मीर घाटी अब मुक्त है आतंकी ताप से,
शांति/ सुकून की ठंडक फैल रही है उधर।
पर रचनात्मक सुधारों पर अंधा विरोध यहां,
फैला रहा है दूषित राजनीति का कुहासा जमकर।।3।।

 
शीत की इस ठंडक में अंधविरोध की आग।
बंदूक है नासमझ लोगों के कंधों पर।।
ओ! कुटिल राजनीति वालों! लानत है,
तुम्हारे इन राष्ट्रविरोधी धंधों पर।।4।।
लेखक के बारे में
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्‍यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय.... और पढ़ें

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