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कविता : एक साहित्यिक गोष्ठी का सारांश

poem on literature
शहर के तमाम बुद्धिजीवियों 
कथाकारों और कवियों ने 
हिन्दुस्तान की समस्याओं 
को लेकर संगोष्ठी की
मंच पर हिन्दुस्तान का 
नक्शा लगा हुआ था 
किसी ने बताया कि नक्शे के 
इस भाग पर भुखमरी की समस्या 
तो किसी ने बताया इस भाग पर 
बेरोजगारी है कोई किसी हिस्से पर 
हुए बलात्कार की घटना से 
परेशान था तो कोई किसी का 
किसी स्थान पर हुए आत्महत्या और 
मानवाधिकारों के उल्लंघन से 
हुआ बुरा हाल था 
संगोष्ठी के बाद खानपान 
और पीने का दौर चला 
और बुद्धिजीवियों ने पी-पीकर 
अनेक बोतलों को खाली कर 
सभी समस्याओं को उन्हीं बोतलों में बंद कर दिया। 
और इस बीच हिन्दुस्तान का 
नक्शा अब जमीन पर गिरकर फड़फड़ा रहा था।
लेखक के बारे में
राकेशधर द्विवेदी
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