biodatamaker

कविता : बचपन का जमाना

Updated: शनिवार, 4 नवंबर 2017 (16:17 IST)
- शिवानी गीते
बड़ा याद आता है वो बचपन का जमाना,
मां की गोद में सोना और दोस्तों संग पतंग उड़ाना,
छोटी-छोटी बातों पर एक दूसरे से रूठ जाना,
वो बट्टी बोल एक दूसरे को गले लगा फिर एक हो जाना,
वो भी क्या दिन थे जब हम मिट्टी में खेलते थे,
पेड़ों से आम तोड़ने के लिए, एक दूसरे पर खड़े हो एक दूसरे का बोझा भी झेलते थे,
 
खेलते थे खेल हम जो सभी बड़े निराले थे,
मस्ती में घूमते थे और कहते हमें सब मतवाले थे,
छोटी-सी साईकल होती थी हमारे पास,
और लेकर निकल पड़ते थे उसे हम कहीं दूर दराज।
 
बड़े से आंगन में खुले आसमान के नीचे नानी हमें कहानियां बड़ी सुनाती थी।
रात में भूत के नाम से हम उन्हें डराते और झूठ-मूठ में वो भी डर जाती थी।
गिल्ली डंडा, बर्फ पानी जैसे खेल तो अब पुराने हो गए,
भाग दौड़ भरी जिंदगी में हम अपनो अनजाने हो गए।
नानी की कहानी, दादी की डांट सुने तो जमाने हो गए,
वो भी क्या दिन थे, कहते- कहते हम जवानी में बचपन के दीवाने हो गए।
 
त्यौहार पर दादा दादी के पैर छुना पूराने रिवाज हो गए,
बैठ कर बचपन की यादें ताज़ा करते हुए ना जाने कितने इतवार हो गए।
उम्र बढ़ती रही और वो ना जाने मन में कहा खो गया,
वो हमारा बचपन है रुठ कर आंख मूंद कर सो गया।
आखिर एक ही तो है हमारा सबसे अनमोल खजाना,
बड़ा याद आता है वो बचपन का जमाना।

Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

15 अगस्त विशेष: शहीदों के सपनों का भारत नारों से नहीं, हमारे चरित्र और कर्म से बनेगा

जब उम्मीद थक जाए, तब साहस काम आता है

असली पनीर और Analog Paneer में क्या है फर्क? खरीदने से पहले ऐसे करें पहचान

लोकतंत्र की पहली पाठशाला: छात्रसंघ चुनावों की वापसी क्यों जरूरी? जानें युवाओं की बड़ी जिम्मेदारी

गरीबी चुराने कोई नहीं आता!

अगला लेख