sundarkand

कविता: नदी सदा बहती रही

Updated: शनिवार, 16 दिसंबर 2017 (16:59 IST)
हमसे भी और तुमसे भी, 
तो बढ़ने को कहती रही।
नदी सदा बहती रही, 
नदी सदा बहती रही।
 
1.
पाषाणों की गोदी हो,
या रेतीली धरती।
अपने दिल का हाल, 
भला कब अपनों को कहती।
 
चोट हृदय में अपने वो,
सदियों से सहती रही।
नदी सदा बहती रही,
नदी सदा बहती रही।
 
2.
उठतीं-गिरतीं लहरें,
हमसे-तुमसे करे इशारे।
उतार-चढ़ाव जीवन के,
दाएं-बाएं किनारे।
 
मुक्तभाव से जीवन में,
सुख-दुःख वो गहती रही।
नदी सदा बहती रही,
नदी सदा बहती रही।
 
3.
जीवन में स्वीकार किया,
कब उसने ठहराव।
हर पल अपने में उसने,
कायम रखा बहाव।
 
संघर्षों की गाथा धूप की,
चादर में लिखती रही।
नदी सदा बहती रही,
नदी सदा बहती रही।
 
4.
अपनी राह बनाने की,
करती कवायद पूरी।
उद्गम स्थल से नापती,
सागर तट की दूरी।
 
मिले शिखर जीवन में,
हरदम वो कहती रही।
नदी सदा बहती रही,
नदी सदा बहती रही।
लेखक के बारे में
अमरेश सिंह भदोरिया

Show comments

सभी देखें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

कांवड़ यात्रा : ‘बोल बम’ का सनातन संदेश

भारत की विभिन्नताओं में समाहित है अटूट अभिन्नता!

स्पेन में मोरक्को से घुसपैठ, यूरोपीय संघ में मचा हड़कंप

दादाजी की याद में पोती की पाती, पढ़कर आंखें भी नम होगी, उर्जा भी मिलेगी

क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस? जानिए इतिहास और इसका महत्व

अगला लेख