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जिंदगी का फलसफा सिखाते हैं मेरे दोहे

Updated: मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019 (12:36 IST)
निकले थे घर से कभी, हम सपनों के साथ।
इक-इक करके राह में, सबने छोड़ा हाथ॥
 
सच से होगा सामना, तो होगा परिवाद।
बेहतर है कि छोड़ दो, सपनों से संवाद॥
 
प्यारी दैरो-हरम से, तेरी ये दहलीज़।
मैंने तेरे नाम का, डाल लिया ताबीज़॥
 
तुमने अपने प्रेम का, डाला रंग अबीर।
घर बारै मैं आपना, होता गया कबीर॥
 
रोके से रुकता नहीं, करता मन की बात।
हम लाचार खड़े रहें, मन की ऐसी जात॥
 
कल मुझसे टकरा गई, इक नखराली नार।
अधर पांखुरी फूल की, चितवन तेज कटार॥
 
तुमने छेड़ा प्यार का, ऐसा राग हुज़ूर।
सदियों तक बजता रहा, दिल का ये संतूर॥
 
देखो ये संसार है, या कि भरा बाज़ार।
संबंधों के नाम पर, सभी करें व्यापार॥
 
दुई रोटी के वास्ते, छोड़ दिया जब गांव।
भरी दुपहरी यार क्यों, ढूंढ रहे छांव॥
 
लौट बाराती सब चले, अपने-अपने गांव।
रुके रहे देहरी पे, रोली वाले पांव॥
 
कवि-पं. हेमन्त रिछारिया
लेखक के बारे में
पं. हेमन्त रिछारिया
ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया ज्योतिष प्रभाकर उपाधि से सम्मानित हैं। विगत 12 वर्षों से ज्योतिष संबंधी अनुसंधान एवं ज्योतिष से जुड़ी गलत धारणाओं का खंडन कर वास्तविक ज्योतिष के प्रचार-प्रसार में योगदान दे रहे हैं। कई ज्योतिष आधारित पुस्तकों का लेखन।.... और पढ़ें

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