हिन्दी को सरल रहने दीजिए

सुधा अरोड़ा|
हिन्दी के पाठयक्रमों में 'सफाई' की जरूरत है... 
 
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> > हिन्दी पढ़ाने की गलत नींव से एक अनवरत सिलसिला शुरू होता है, जो हर राज्य के अलग-अलग पाठयक्रमों में एमए, पीएचडी तक चलता है। सन 1968 से, जब से मैंने कलकत्ता के एक अहिन्दीभाषी कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया, जहां अधिकांश छात्राएं बंगाली थीं, लगातार इस बात को महसूस किया कि हमारा पाठयक्रम समय के साथ चलने में बिल्कुल असमर्थ हैं। 
इतने सालों में लगातार इस बारे में बोलती लिखती आ रही हूं पर कहीं कोई बदलाव के आसार दिखाई नहीं देते।

हिन्दी भाषा को अगर जिंदा रखना है तो पहली कक्षा की नर्सरी राइम्स से लेकर एमए के पाठयक्रम तक में पूरी तरह सफाई की जरूरत है। क्या आप विश्वास करेंगे कि तीसरी कक्षा के कोर्स में किसी एक ही कवि की लिखी हुई कुछ अधकचरी कविताओं की एक किताब है जिसमें न सही तुकबंदी है, न सही मात्राएं, न सही व्याकरण। उसकी पहली कविता है -

जिस पर चरण दिए हम, जिसको नमन किए हम,
उस मातृभूमि की रज को. . .




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