पुस्तक समीक्षा : 'सरहदें' तोड़ता है कई तरह की सरहदें

समीक्षक- राजेन्द्र वर्मा

कवि हमेशा सीमाएं तोड़ता है, वे चाहें जिस भी प्रकार की हों- राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक अथवा आर्थिक। मनुष्य सामाजिक प्राणी है और समाज के बिना उसका काम नहीं चलता इसलिए वह सामाजिक नियमों में आसानी से बंध जाता है।
यहां तक तो ठीक, पर जल्द ही समाज के ठेकेदार उसे कतिपय निर्देश देने लगते हैं कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? कभी-कभी ये निर्देश मनमाने और मनुष्यविरोधी भी होते हैं। तब किसी संवेदनशील व्यक्ति के लिए इनका विरोध आवश्यक हो जाता है। जब यह विरोध किसी कलात्मक विचार द्वारा प्रकट होता है तो वह 'कविता' का रूप धारण कर लेता है।

'सरहदें' प्रबुद्ध कवि का ऐसा ही काव्य संग्रह है, जो समाज और राजनीति द्वारा बनाई गई अनेक प्रकार की सरहदों की पड़ताल कर उन्हें तोड़ने का आह्वान करता है। इस प्रकार कवि प्रेम से परिपूर्ण वैश्विक समाज की संरचना का स्वप्न देखता है।
प्रस्तुत काव्य संग्रह से पूर्व कवि की काव्य कृति, 'पीढ़ी का दर्द' बहुत पहले हिन्दी काव्य जगत में पर्याप्त चर्चित और समादृत हो उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान से पुरस्कृत भी हो चुकी है। कवि ने 'ईर्ष्या' शीर्षक से लघुकथा संग्रह भी हिन्दी साहित्य को दिया है। उसने बच्चों के लिए भी कथाएं लिखी हैं, जो 'शेरनी मां' के नाम से खूब चर्चित हैं।

आशय यह कि कवि सुबोध श्रीवास्तव का नाम हिन्दी जगत में नया नहीं है। कवि के पास सृजन हेतु पर्याप्त काव्यानुभव है। पत्रकारिता उसका पेशा है इसलिए उसे समसामयिक स्थितियों को देखने व परखने आदि के लिए किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं। काव्य की मुक्त छंद शैली के अतिरिक्त कवि को छंदोबद्ध कविता में भी यथेष्ट दक्षता प्राप्त है। यद्यपि छांदस काव्य में दोहा, मुक्तक, गीत, गजल विधा में उसकी कृतियां आनी शेष हैं।
समीक्ष्य कृति 'सरहदें' में 51 कविताएं संगृहीत हैं, जो 2 खंडों- सरहदें और एहसास (प्रेम कविताएं) में विभाजित हैं। पहले खंड में 42 तथा दूसरे खंड में 9 कविताएं व्यवस्थित हैं। 82 पृष्ठों में 51 कविताएं अर्थात प्रत्येक कविता औसत 2 पृष्ठों की। सभी कविताओं के प्रारंभ में रेखांकन दिए गए हैं, जो काव्यवस्तु के सम्प्रेषण में सहायक हैं। इससे कृति का कलात्मक मूल्य भी बढ़ गया है, पर रेखांकन की सीमाएं भी होती हैं।
सभी कविताएं मुक्त छंद श्रेणी की हैं, बल्कि इन्हें यदि गद्य कविता कहा जाए तो न्यायोचित होगा तथापि इनमें लय है, जो यति और गति के समन्वय से बनी है। कविताओं का मूल स्वर आशावादी है, प्रकृति से प्रेम है और जीवन की मृदुल स्मृतियों के मध्य निश्छल प्रेम-ममत्व की सांस्कृतिक झांकियां हैं, जो पाठक के हृदय को भिगोती चलती हैं और उन्हें एक सहज जीवन का आह्वान करती हैं।

शीर्षक कविता 'सरहदें' के अंतर्गत 11 छोटी-छोटी कविताएं हैं। इनकी वर्ण्यवस्तु देशज सीमाएं ही नहीं, आदमी-आदमी के बीच पनप आई दूरियां भी हैं। इन कविताओं में कवि इन तरह-तरह की दूरियों को पहचानकर उन्हें दूर करने के उद्यम भी सुझाता है और बिखरे हुए हृदय को प्रेम और विश्वास को संजोकर फिर से जीना सिखाता है।
सरहदों का बनना, उनका बने रहना, उनमें घुट-घुट जीना, सरहदों का टूटना और सरहद के वजूद को परे झटक देना आदि अनेक पहलुओं पर कवि की दृष्टि गई है और उसने विभिन्न अभिव्यक्तियों में यही प्रयास किया है कि पाठक सरहदों को समझे और अव्वल उनमें पड़े नहीं और अगर पड़ ही गया हो, तो उनसे कैसे बाहर निकले?

इस शीर्षक की पहली कविता है-

हमेशा/ कायम नहीं रहतीं सरहदें...
याद है मुझे/ उस रोज जब/ अतीत की कड़वाहट/ भूलकर उसने/ भूले-बिसरे सपनों को फिर संजोया,
यादों के घरौंदे में रखी/ प्यार की चादर ओढ़ी/ और उम्मीद की उंगली थामकर चल पड़ा,
उसे मनाने/ तेज आवाज के साथ टूटीं सरहदें/ और रूठकर गई जिंदगी/ वापस दौड़ी चली आई...

कविता के समाप्त होते-होते पाठक को अजीब-सी राहत मिलती है, यही इस कविता की ताकत है। कवि को यकीन है कि कैसी भी सरहद हो, एक दिन वह टूटकर रहेगी, बशर्ते हम माहौल बनाने की कोशिश करें।
'सरहदें' की 5वीं कविता है-

टूटकर रहेंगी सरहदें/ भले ही खड़े रहो तुम/ मजबूती से पांव जमाए तरफदारी में।
विश्वास है मुझे/ जब किसी रोज/ क्रीड़ा में मगन/ मेरे बच्चे/ हुल्लड़ मचाते गुजरेंगे करीब से/
सरहद के/ एकाएक/ उस पार से उभरेगा एक समूह स्वर/ 'ठहरो! खेलेंगे हम भी तुम्हारे साथ...'
एक पल को ठिठकेंगे फिर सब बच्चे हाथ थामकर एक-दूसरे का/ दूने उत्साह से निकल जाएंगे दूर
खेलेंगे संग-संग/ गाएंगे गीत प्रेम के, बंधुत्व के/ तब/ न रहेंगी सरहदें/ न रहेंगी लकीरें...
संग्रह की प्रारंभिक कविताओं में एक कविता है, 'उसे आना ही है...'। कविता का शीर्षक स्वयं में कविता है और अपने आशय का सकारात्मक संकेत देती है।

कविता देखें-

खोल दो/ बंद दरवाजे-खिड़कियां/ मुग्ध न हो, न हो प्रफुल्लित/ जादू जगाते/ दीपक के आलोक से। निकलो/ देहरी के उस पार/ वंदन-अभिनंदन में/ श्वेत अश्वों के रथ पर सवार/ नवजात सूर्य के।

वो देखो/ चहचहाने लगे पंछी/ सतरंगी हो उठीं दिशाएं/ हां, सचमुच/ कालिमा के बाद आना ही है उसे रश्मियां बिखेरकर/ आह्लादित करने/ विश्व क्षितिज को...
कविता 'थमती नहीं नदी' में कवि नदी से निरंतरता, निर्भीकता, चंचलता, चारुता, गंभीरता आदि गुणों का संचय करता है और उन्हें पाठकों के सामने कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया है, मानो वह पहली बार नदी से मुखातिब हो।

पंक्तियां देखें-

कभी/ किसी से रोकने से नहीं रुकती नदी/ न ही किसी पड़ाव पे/ रुकावट से भयभीत हो/ रुख बदलती है।

नदी चंचल होती है/ लेकिन गांभीर्य भी नहीं खोती/ कभी वात्सल्य उड़ेलती है/ हमेशा/ बड़े दुलार से दोनों किनारों पर।
मैं, पुल होकर/ साक्षी हूं उसकी निरंतरता का/ इसलिए भाता है मुझे/ उसको अपलक निहारते रहना।

नदी- जो दोनों किनारों को/ दुलराती तो है, मगर/ तनिक भी जन्मने नहीं देती मोह/ शायद इसीलिए कभी थमती नहीं वह/ बहती जाती है, बहती जाती है...

'नहीं चाहिए चांद' कविता में कवि की प्रकृति के प्रति झुकाव संबंधी दृष्टिसंपन्नता हमें आश्चर्यचकित करती है। वह आकाश अथवा उसमें बसे चांद-तारों का आग्रही नहीं, सूरज को भी मुट्ठी में बंद करने का इच्छुक नहीं, वह तो बस धरती में रच-बसकर जीना चाहता है- किसानों के हल के साथ सौंधी मिट्टी में गतिशील रहकर, बच्चों के खेलों में मगन और पंछियों की चहचहाहट में मुग्ध रहते हुए...।
लेकिन यह तभी संभव है, जब उसके भीतर एक आम आदमी सांस लेता रहे-

मुझे नहीं चाहिए चांद/ और न ही तमन्ना है/ कि सूरज कैद हो मेरी मुट्ठी में/ हालांकि भाता है मुझे दोनों ही का स्वरूप।

सचमुच/ आकाश की विशालता भी मुग्ध करती है/ लेकिन तीनों का एकाकीपन/ अक्सर/ बहुत खलता है शायद इसलिए मैंने कभी नहीं चाहा कि हो सकूं/ चांद/ सूरज और आकाश जैसा, क्योंकि/ मैं घुलना चाहता हूं खेतों की सौंधी माटी में/ गतिशील रहना चाहता हूं/ किसान के हल में/ खिलखिलाना चाहता हूं दुनिया से अनजान खेलते बच्चों के साथ/ हां, मैं चहचहाना चाहता हूं।
सांझ ढले, घर लौटते/ पंछियों के संग-संग/ चाहत है मेरी/ कि बस जाऊं वहां-वहां/ जहां सांस लेती है जिंदगी और/ यह तभी संभव है/ जबकि मेरे भीतर जिंदा रहे/ एक आम आदमी।

खंड दो : एहसास में लघु कलेवर की प्रेम कविताएं हैं जिनमें चिड़िया, फूल, सूरज समुंदर आदि के बहाने प्रेमाभिव्यक्ति की गई है। कवि की कोमल अनुभूतियां जहां पाठक के हृदय में प्रेम जगाती हैं, वहीं समय की निष्ठुरता को भी सामने लाती हैं। 'मौसम-सी तुम' कविता में नायिका को मौसम की तरह मानकर उसे संबोधित किया गया है। इसमें नायक की गहरी प्रेमानुभूति है, तो नायिका के बदलते जाने का चित्रण भी है, लेकिन वह बदलाव किसी मौसम की तरह है-
मेरे अपने!/ वादा था तुम्हारा।

लेकिन वापस नहीं लौटे तुम...
मझे इस सब पे कि ताज्जुब भी नहीं/ न ही कोई टीस है अंतरमन में मेरे,
क्योंकि एहसास है मुझे/ कि वादे ज्यादातर तोड़ दिए जाते हैं/ और अक्सर लौटते भी नहीं जाने वाले।

आजकल मौसम का मिजाज भी तो कुछ ऐसा ही है, बिलकुल तुम्हारे जैसा!

इन कविताओं के अलावा संग्रह में आज भी वर्षा : एक शब्दचित्र, बेहतर दुनिया के लिए, अपराजित, जब एक दिन (पर्यावरण कथ्य पर), उसकी चुप (मदर टेरेसा का शव देखने पर), सुबह, नियति आदि पठनीय और उद्धरणीय कविताएं हैं।
कविताओं की भाषा बोलचाल की है। उनमें अपेक्षित रवानी भी है इसलिए पाठक कविताओं में डूबता चलता है। यों संग्रह की सभी कविताएं अपने उद्देश्य में सफल हैं, पर 'बंदूकें' और 'वो दरख्त' कविताएं अधूरी-सी प्रतीत होती हैं। कविताओं में तमाम बोलचाल के उर्दू के शब्द नागरी लिपि में लिखे गए हैं, जो रवानी बढ़ाने के कारण स्वागतेय हैं।

आशा है, संग्रह की कविताओं का खूब स्वागत होगा और कवि सुबोध श्रीवास्तव अपने नए काव्य संग्रह के साथ बहुत शीघ्र हिन्दी साहित्य जगत के सम्मुख प्रस्तुत होंगे। कवि और प्रकाशक को एक अच्छे काव्य संग्रह के प्रकाशन हेतु बधाइयां!
समीक्षित कृति : सरहदें (कविता संग्रह)


लेेेेखक : सुबोध श्रीवास्तव

ISBN 978-93-83969-72-2

प्रथम संस्करण : 2016।

मूल्य : 120 रु. (पेपरबैक)।

प्रकाशक : अंजुमन प्रकाशन, 942, आर्य कन्या चौराहा, मुट्ठीगंज, इलाहाबाद।

पिन : 211003।


 

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