हरिद्वार शांतिकुंज आश्रम

shantikunj haridwar
हरिद्वार के सप्त सरोवर क्षेत्र में ऋषिकेश रोड़ पर स्टेशन से 6 किलोमिटर दूर महर्षि विश्वामित्र की तपोभूमि पर पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एवं वंदनीया भगवती देवी शर्मा ने एक बहुत ही सुंदर आश्रम की स्थापना करके उसका नाम रखा शांतिकुंज गायत्री परिवार आश्रम। गायत्री परिवार जीवन जीने कि कला के, संस्कृति के आदर्श सिद्धांतों के आधार पर परिवार, समाज, राष्ट्र युग निर्माण करने वाले व्यक्तियों का संघ है।

जाति, संप्रदाय, धर्म, पंथ आदि संकीर्णताओं से ऊपर उठकर लोगों को यह जीवन जीने की कला सिखाता है। यहां पर हिन्दुओं की सभी जाति के लोग पंडित हैं और हवन कराने में दक्ष हैं। जातियों को बंधन को तोड़कर यह परिवार युगनिर्माण एवं वैदिक विचारधारा, सेवा और परोपकार की भावना को प्रोत्साहित करता है।

1. यहां पर आचार्य श्री रामशर्मा और उनकी पत्नी भगवती देवी शर्मा का समाधि स्थल भी है।

2. शांतिकुंज के अन्दर गायत्री माता की मूर्ति के पास अखंड दीपक 1926 से निरंतर जल रहा है।

3.शांतिकुंज से ही अखंड ज्योति नामक एक पत्रिका का प्रकाशन भी होता है।

4. यहां लगभग 24 लाख (24,00,000) गायत्री मंत्र समर्पित आध्यात्मिक साधक द्वारा रोजाना गाए जाते हैं और लगभग 1000 लोग गायत्री यज्ञ में भाग लेते हैं।

5. ऋषि परंपरा को पुनरजीवन करने के लिए हिमालय के ऋषि सट्टा के मार्गदर्शन में शांतिकुंज की स्थापना की गई है।

6. शांतिकुंज की स्थापना 1971 में पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य के द्वारा जमीन के एक छोटे से टुकड़े में की गयी। बाद में इसका विस्तार होता गया।

7. इस समय शांतिकुंज आश्रम हरिद्वार के प्रमुख डॉ. प्रणव पांड्या हैं।

8. आचार्य श्रीराम शर्मा के 'हम बदलेंगे युग बदलेगा' के उद्घोष को पुरी दुनिया में ख्याति मिली है।

9. शांतिकुंज में पंडित श्रीराम शर्मा द्वारा लिखित सैंकड़ों पुस्तकें हैं। वे मानते थे कि विचार क्रांति से ही युग बदलेगा।

10. श्रीराम शर्मा आचार्य का परिचय :

शांति कुंज के संस्थापक श्रीराम शर्मा आचार्य ने हिंदुओं में जात-पात को मिटाने के लिए गायत्री आंदोलन की शुरुआत की। सभी जातियों के लोगों को बताया कि ब्राह्मणत्व प्राप्त कैसे किया जाए। जहां गायत्री के उपासक विश्वामित्र ने कठोर तप किया था उसी जगह उन्होंने अखंड दीपक जलाकर हरिद्वार में शांतिकुंज की स्थापना की। गायत्री मंत्र के महत्व को पूरी दुनिया में प्रचारित किया। आपने वेद और उपनिषदों का सरलतम हिंदी में श्रेष्ठ अनुवाद किया।

20 सितम्बर, 1911 आगरा जिले के आंवलखेड़ा गांव में जन्म हुआ। उनके पिता का नाम श्री पं.रूपकिशोर शर्मा था। अखण्ड ज्योति नामक पत्रिका का पहला अंक 1938 की वसंत पंचमी पर प्रकाशित किया गया। अस्सी वर्ष की उम्र में उन्होंने शांतिकुंज में ही देह छोड़ दी। उनकी पत्नी भगवती देवी शर्मा ने उसने कार्य में बराबरी से साथ दिया। शांतिकुंज, ब्रह्मवर्चस, गायत्री तपोभूमि, अखण्ड ज्योति संस्थान एवं युगतीर्थ आंवलखेड़ा जैसी अनेक संस्थाओं द्वारा युग निर्माण योजना का कार्य आज भी जारी है। 2 जून सन 1090 को उनका शांतिकुंज में निधन हो गया।



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