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Devshayani Ekadashi Katha: देवशयनी/ हरिशयनी एकादशी की व्रत कथा

Updated: शनिवार, 25 जुलाई 2026 (11:24 IST)
Hari Shayani ekadashi katha: हरिशयनी एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी या आषाढ़ी एकादशी भी कहा जाता है आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए क्षीरसागर में योगनिद्रा के लिए चले जाते हैं, जिसे 'चातुर्मास' कहा जाता है।ALSO READ: Devshayani Ekadashi 2026: देवशयनी एकादशी से शुरू होंगे चातुर्मास, 4 महीने के लिए लग जाएगी मंगल कार्यों पर रोक

मान्यता है कि जो व्यक्ति हरिशयनी एकादशी का व्रत श्रद्धापूर्वक करता है, उसके जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यह व्रत सभी प्रकार की मनोकामनाओं को पूरा करने वाला और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाला माना गया है।
 

यहां हरिशयनी/ देवशयनी एकादशी पर राजा मांधाता की प्रमुख कथा, पारंपरिक तथा पौराणिक व्रत कथा दी गई है:

 

देवशयनी एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, मांधाता नाम के एक अत्यंत चक्रवर्ती, धर्मनिष्ठ और प्रजापालक राजा थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी, समृद्ध और धर्म-कर्म में लीन रहती थी। एक समय उनके राज्य में लगातार तीन वर्षों तक भयंकर अकाल पड़ा। 
 
वर्षा न होने के कारण नदियां-तालाब सूख गए, फसलें नष्ट हो गईं और प्रजा अन्न-जल के बिना व्याकुल होने लगी। राज्य में यज्ञ, हवन और पूजा-पाठ आदि अनुष्ठान भी बंद होने लगे। अपनी प्रजा का दुख देखकर राजा मांधाता अत्यंत दुखी हुए। वे सोचने लगे कि उनसे ऐसा कौन-सा पाप हुआ है, जिसकी सजा पूरी प्रजा भुगत रही है।
 

ऋषी अंगिरा से भेंट

प्रजा के कष्ट दूर करने का उपाय खोजने के लिए राजा मांधाता सेना के साथ वन की ओर प्रस्थान कर गए। वन में भटकते हुए वे महर्षि अंगिरा के आश्रम पहुंचे। राजा ने ऋषिवर को प्रणाम किया और अपने आने का कारण बताया।
 

महर्षि अंगिरा ने राजा से कहा:

 
'हे राजन्! यह सतयुग है। इस युग में छोटा-सा पाप भी बड़ा फल देता है। आपके राज्य में एक ऐसा व्यक्ति निवास कर रहा है जो धर्म के नियमों के विरुद्ध तपस्या कर रहा है, जिसके कारण यह अकाल पड़ा है।' राजा मांधाता ने कहा, 'हे ऋषिवर! मैं किसी निरपराध को दंड नहीं दे सकता। कृपया मुझे ऐसा कोई सुलभ उपाय बताएं जिससे मेरी प्रजा का कल्याण हो और वर्षा हो सके।'
 

देवशयनी एकादशी का व्रत

तब महर्षि अंगिरा ने राजा को उपाय बताते हुए कहा: 'हे राजन! तुम आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की हरिशयनी/ देवशयनी एकादशी का विधि-विधान से व्रत करो। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हारे राज्य में शीघ्र ही उत्तम वर्षा होगी और प्रजा के सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।' 
 
महर्षि अंगिरा के वचनों को सुनकर राजा मांधाता अपने नगर लौट आए। आषाढ़ शुक्ल एकादशी आने पर राजा ने अपनी पूरी प्रजा और मंत्रियों के साथ मिलकर अत्यंत श्रद्धा एवं विधि-विधान से हरिशयनी एकादशी का व्रत और पूजन किया।
 

व्रत का फल

व्रत के प्रभाव से भगवान श्री हरि विष्णु अत्यंत प्रसन्न हुए। देखते ही देखते राज्य में घनघोर बादल छा गए और मूसलाधार वर्षा होने लगी। सूखी धरती फिर से हरी-भरी हो गई, फसलें लहलहाने लगीं और पूरी प्रजा अन्न-धन से परिपूर्ण हो गई।
 
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लेखक के बारे में
राजश्री कासलीवाल
श्रीमती राजश्री कासलीवाल पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों का अनुभव। धर्म, व्रत-त्योहार, ज्योतिष, रेसिपी, साहित्य, लाइफ स्टाइल और अन्य विषयों पर लेखन का कार्य। वर्तमान में विश्‍व के पहले हिंदी पोर्टल वेबदुनिया में सीनियर सब-एडिटर (कंटेंट) के पद पर कार्यरत हैं।  .... और पढ़ें

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