Devshayani Ekadashi 2026: कब है देवशयनी एकादशी? जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पारण का सही समय
आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवशयनी एकादशी (इसे आषाढ़ी एकादशी या हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं) कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन से भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं और इसी दिन से चातुर्मास का प्रारंभ हो जाता है।
- एकादशी तिथि (उदयातिथि): शनिवार, 25 जुलाई 2026
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई 2026 को सुबह 09:12 बजे से
- एकादशी तिथि समाप्त: 25 जुलाई 2026 को सुबह 11:34 बजे तक
पारण (व्रत खोलने) का शुभ समय
एकादशी व्रत का पारण हमेशा द्वादशी तिथि के दिन सुबह सूर्योदय के बाद किया जाता है।
पारण की तिथि: रविवार, 26 जुलाई 2026
शुभ पारण समय: सुबह 06:13 बजे से सुबह 08:50 बजे तक
नोट: ध्यान रखें कि पारण हमेशा द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले और हरि वासर बीतने के बाद ही करना चाहिए।
देवशयनी एकादशी व्रत के 5 खास नियम
यदि आप देवशयनी एकादशी का व्रत रख रहे हैं, तो इन 5 प्रमुख नियमों का पालन करना अत्यंत आवश्यक माना गया है:
1. सात्विक जीवन और दशमी तिथि से परहेज
एकादशी का व्रत वास्तव में तीन दिनों (दशमी, एकादशी और द्वादशी) के नियमों से जुड़ा होता है। दशमी तिथि की शाम से ही तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस, मदिरा) का त्याग कर देना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
2. चावल और अन्न का पूरी तरह त्याग
एकादशी के दिन अन्न ग्रहण करना सख्त वर्जित है, विशेष रूप से चावल का सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए। शास्त्रों के अनुसार इस दिन चावल खाने से दोष लगता है। आप फलाहार (फल, दूध, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा) ले सकते हैं।
3. तुलसी दल (पत्ते) तोड़ने का नियम
भगवान विष्णु की पूजा बिना तुलसी दल के अधूरी मानी जाती है। लेकिन एकादशी तिथि के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित होता है। इसलिए पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले (दशमी की शाम को) ही तोड़कर रख लें।
4. वाणी व व्यवहार में संयम (क्रोध व निंदा से बचें)
व्रत का अर्थ केवल भूखा रहना नहीं, बल्कि मन को शुद्ध रखना है। एकादशी के दिन किसी की चुगली न करें, झूठ न बोलें, किसी पर क्रोध न करें और न ही किसी का अपमान करें। पूरा दिन प्रभु स्मरण ("ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र जाप) में बिताएं।
5. सही समय और विधि से पारण
व्रत का पूरा फल तभी मिलता है जब उसका पारण शास्त्र सम्मत समय पर किया जाए। द्वादशी के दिन सुबह स्नान-ध्यान के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें, किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को दान-दक्षिणा दें। इसके बाद ही तुलसी दल और चरणामृत लेकर व्रत खोलें।