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हिंदुस्तान कमाल है, मुंबई, बेंगलुरु, पुणे और पूरे भारत ने Zomato-Swiggy के ज़रिए छात्रों तक सिर्फ खाना नहीं, हौसला भी पहुंचाया, सलाम है आपको!

Updated: बुधवार, 22 जुलाई 2026 (13:27 IST)
मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और पूरे भारत ने जिस तरह जंतर-मंतर पर जुटे छात्रों तक अपना प्यार पहुंचाया, वह इस देश की असली पहचान है।

भारत की आत्मा हमेशा से एक ही रही है—जब कोई भूखा हो तो अपने हिस्से की रोटी भी बांट देना, जब कोई प्यासा हो तो अपना घड़ा आगे बढ़ा देना। यहां किसी को भोजन कराना केवल पेट भरना नहीं, बल्कि प्रेम, करुणा और अपनत्व का सबसे पवित्र रूप माना गया है। यही हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी पूंजी है।

लेकिन दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल के दिनों में जो दृश्य सामने आए, उन्होंने हर संवेदनशील भारतीय को भीतर तक झकझोर दिया। अपने अधिकारों की मांग कर रहे छात्रों और युवाओं पर पुलिस तथा रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की कार्रवाई की तस्वीरें विचलित करने वाली थीं। लाठियां, आंसू गैस, धक्का-मुक्की और घसीटते हुए युवाओं की तस्वीरें केवल एक प्रदर्शन की कहानी नहीं थीं, बल्कि उस बेचैनी की तस्वीर थीं जो आज देश का युवा महसूस कर रहा है।

ये वे छात्र थे जो हथियार नहीं, किताबें लेकर आए थे। हाथों में तिरंगा था, कुछ के हाथों में फूल थे। उनकी मांग कोई असंभव नहीं थी—परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, पेपर लीक पर रोक और जवाबदेही तय करने की मांग। लेकिन उनकी आवाज का जवाब बल प्रयोग से दिया गया।

और फिर सामने आया हिंदुस्तान का सबसे खूबसूरत चेहरा

जब दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्र भूखे-प्यासे, बारिश और पुलिस कार्रवाई के बीच डटे हुए थे, तब देश के दूसरे शहरों में बैठे लोगों ने भी खुद को इस आंदोलन से जुड़ा हुआ महसूस किया।
मुंबई, बेंगलुरु, पुणे और देश के अनेक हिस्सों से लोगों ने ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रदर्शन स्थल तक भोजन, चाय और नाश्ता भेजना शुरू किया। कई ऑर्डर गुमनाम थे। डिलीवरी नोट में केवल इतना लिखा था—

"जिसे सबसे ज्यादा जरूरत हो, उसे दे दीजिए।"
"प्रदर्शन कर रहे छात्रों में बांट दीजिए।"

शायद भेजने वाले कभी उन छात्रों से नहीं मिलेंगे। शायद उन्हें उनका नाम भी नहीं पता होगा। लेकिन उन्हें यह जरूर पता था कि संघर्ष कर रहे किसी अनजान युवा तक उनका स्नेह-समर्थन पहुंचना चाहिए।

यही भारत है। यही देश की असली ताकत है

जहां गुरुद्वारों ने अपने दरवाजे खोले, गुरुद्वारे के सेवादार दरवाजे के बाहर खड़े हो गए और पुलिस को भीतर नहीं आने दिया, वहीं कई डॉक्टर घायल छात्रों के उपचार के लिए स्वयं पहुंच गए। अनेक ऑटो और कैब चालकों ने बिना किराया लिए छात्रों को सुरक्षित घर पहुंचाने का जिम्मा उठाया।

यह केवल सेवा नहीं थी। यह नागरिकता का सबसे सुंदर रूप था।

सलाम है आपको...
सलाम है मुंबई को।
सलाम है बेंगलुरु को।
सलाम है पुणे को।
और सलाम है पूरे हिंदुस्तान को।

आपने एक बार फिर साबित कर दिया कि भारत की असली ताकत उसकी सरकारें या उसकी इमारतें नहीं, बल्कि उसके लोग हैं।

जब एक शहर का युवा संघर्ष करता है और दूसरे शहर का कोई अनजान नागरिक उसके लिए भोजन भेजता है, तब भारत केवल एक भूगोल नहीं रहता—वह एक परिवार बन जाता है।

यह केवल खाने का पैकेट नहीं था।

यह एक संदेश था— "हम तुम्हारे साथ हैं।" "तुम अकेले नहीं हो।"

नई पीढ़ी बदल रही है राजनीति का अर्थ

लंबे समय तक यह धारणा बनाई गई कि यह पीढ़ी सिर्फ मोबाइल स्क्रीन पर जीती है, रील बनाती है और वास्तविक संघर्ष से दूर रहती है। लेकिन इस आंदोलन ने उस धारणा को चुनौती दे दी।

यह वही पीढ़ी है जिसने प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार हुई अनियमितताओं, पेपर लीक, वर्षों की तैयारी के बाद टूटते सपनों और मानसिक दबाव के खिलाफ आवाज उठाई। जब भविष्य दांव पर हो, तब चुप रहना उनके लिए संभव नहीं था।

आज का युवा केवल शिकायत नहीं कर रहा, बल्कि भागीदारी कर रहा है। वह सोशल मीडिया पर अभियान चलाता है, लेकिन जरूरत पड़ने पर सड़क पर भी उतरता है।

वह पुलिस से टकराने नहीं, संवाद करने जाता है। कई जगहों पर लाठीचार्ज झेलने के बाद भी छात्रों ने पुलिसकर्मियों को फूल देकर "We Love You" कहा। यह विरोध का एक नया तरीका है—जहां प्रतिरोध है, लेकिन घृणा नहीं; जहां असहमति है, लेकिन हिंसा नहीं।

यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी शक्ति है।

हिंदुस्तान कमाल है

यह देश बार-बार साबित करता है कि यहां इंसानियत किसी भी दूरी से बड़ी होती है।

कभी कोई सैनिक सीमा पर खड़ा होता है तो पूरा देश उसके साथ खड़ा होता है। कभी किसान खेत में संघर्ष करता है तो लोग उसके लिए आवाज उठाते हैं। और जब छात्र अपने भविष्य के लिए खड़े होते हैं, तब अनजान लोग उनके लिए भोजन भेजते हैं।

यही भारत की पहचान है। जंतर-मंतर पर डटे उन सभी छात्रों को सलाम। अपने भविष्य के लिए आवाज उठाने वाले हर युवा को सलाम।

और उन सभी गुमनाम नागरिकों को भी सलाम, जिन्होंने बिना किसी पहचान या प्रसिद्धि की इच्छा के केवल इंसानियत के नाते अपना हाथ आगे बढ़ाया।

जय हिंद। जय जवान। जय किसान। जय छात्र। और जय उस नई पीढ़ी की, जो सवाल भी पूछना जानती है और एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ना भी।

क्योंकि बेहतर भविष्य केवल सरकारें नहीं बनातीं—उसे जागरूक नागरिक मिलकर बनाते हैं।
लेखक के बारे में
संदीप सिंह सिसोदिया
वन-लाइनर बायो: IIM इंदौर से प्रशिक्षित और 20+ वर्षों का अनुभव रखने वाले डिजिटल मीडिया लीडर व वरिष्ठ संपादक, जिन्होंने BBC,  DW, Yahoo और MSN जैसे वैश्विक संस्थानों के साथ कार्य किया है। वे जियो-पॉलिटिक्स, पर्यावरण और समसामयिक  मुद्दों पर अपने प्रखर लेखन और गहन विश्लेषण के लिए विशेष रूप से.... और पढ़ें

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