भय से भली जोखिम की छलाँग

अनिल त्रिवेदी|
- अनिल त्रिवेद
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और भारत के पूर्व गृहमंत्री, पीडीपी के नेता जनाब मुफ्ती मोहम्मद सईद का यह सुझाव कि जम्मू-कश्मीर में भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की मुद्राएँ प्रचलन में होना चाहिए, पर राजनीतिक विवाद, राष्ट्रद्रोह और पागलपन के आरोप एवं खलबली की स्थिति बनी है।


मुफ्ती मोहम्मद सईद का यह सुझाव नकारात्मक एवं संकुचित रूप में हम सबके सामने आया है। इसलिए ही इस पर तीखी और नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ ही सामने आई हैं। तीखी नकारात्मक प्रतिक्रिया और संकुचित दृष्टि दोनों ही ऐसी वैचारिक क्रिया-प्रतिक्रिया हैं, जो विवाद को गहराती ही हैं पर इससे किसी समाधान या बुनियादी परिवर्तन का कोई रास्ता नहीं निकलता है।
भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान और बांग्लादेश आजादी से पूर्व भारत के हिस्से ही थे। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और किसी भी देश के किसी एक प्रदेश में यह व्यवस्था नहीं हो सकती कि एक देश की बजाय दो देशों की मुद्राएँ उस प्रदेश की सामान्य मुद्रा के रूप में प्रचलित की जाए और बाकी प्रदेशों में नहीं। ऐसा करने से देश की समस्याएँ और ज्यादा उलझ जाएँगी।
इस दृष्टिकोण से अपने संकुचित एवं एकांगी रूप में मुफ्ती मोहम्मद सईद का सुझाव अपनाने लायक नहीं है। पर इस संकुचित स्वरूप के सुझाव की सीमाबंदी को हम खोलकर साझा या एक जैसी मुद्रा की सीमाओं का विस्तार कर भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका, भूटान और हाल में दक्षेस (सार्क) में शामिल अफगानिस्तान की मुद्राएँ 'दक्षेस रुपए' में बदलने की व्यापक एवं खुली दृष्टि को अपना लें तो दक्षेस (सार्क) देशों की अंदरूनी ताकत एकदम बढ़ सकती है।
योरपीयन साझा बाजार की तर्ज पर दक्षेस राष्ट्रों की एकता एवं सहयोग की बात को साकार रूप देने के लिए दक्षिण एशिया के सदस्य देशों की एक साझा (कॉमन) मुद्रा के प्रचलन से इन देशों के बीच परस्पर भय एवं वैमनस्यजन्य प्रतिस्पर्धा की बजाय सहयोग और व्यापार-व्यवसाय के साथ ही दक्षेस के लोकजीवन में शांति और सद्भाव के नए सूर्योदय की लालिमा आ सकती है।
दक्षेस के देशों ने साप्टा के द्वारा आपसी व्यापार और व्यवसाय को बढ़ाने की दिशा में जो प्रारंभिक कदम उठाए हैं उन्हें 'दक्षेस रुपए' के प्रचलन से और ज्यादा मजबूती मिलेगी। नेपाल, भूटान, श्रीलंका और भारत का लोकजीवन पाकिस्तान-बांग्लादेश के मुकाबले आपस में ज्यादा मिलता-जुलता रहा है। श्रीलंका और दक्षिण भारत के मध्य जनजीवन आपस में बहुत जुड़ा हुआ है।

इसी तरह उत्तर भारत और नेपाल के लोकजीवन में भी पारस्परिक सहयोग की लंबी सांस्कृतिक सहयोग, सद्भाव, समन्वय की पुरानी परंपरा है। भारत, पाक, बांग्लादेश, जो दक्षेस के बड़े हिस्से हैं, में आपस में स्वाभाविक सहयोग की प्रक्रिया बहुत सरल नहीं है तो असंभव भी नहीं है। तीनों देशों के बीच प्यार और तकरार की लहरें निरंतर आती-जाती रहती हैं।
कभी हमारे आपसी रिश्ते इतने तनावपूर्ण हो जाते हैं कि हम राजनीतिक स्तर पर बातचीत बंद कर देते हैं, पर इन तीनों देशों में राजनीतिक और कूटनीतिक रिश्ते तोड़ दिए जाने पर भी तीनों देशों के असंख्य परिवारों में चिंता और तनाव एकदम से बढ़ जाता है और एक-दूसरे के हालचाल जानने को तीनों देशों के लाखों परिवार एक-दूसरे की कुशलक्षेम जानने को तरसते रहते हैं, आतुर होते रहते हैं।
इसका कारण स्पष्टतः यह है कि भारत-पाकिस्तान और बांग्लादेश राजनीतिक स्तर पर भले ही लड़कर अलग-अलग हो गए हों, पर इन तीनों देशों में राजनीतिक खटास के दौर में भी पारिवारिक मिठास में कमी नहीं आने पाई है। पिछले साठ सालों में न जाने कितनी बहन-बेटियाँ एक-दूसरे देशों में ब्याही गई हैं और किसी भी स्थिति में इन तीनों देशों के बीच लोक व्यवहार कभी बंद हुआ ही नहीं। यह जरूर हुआ है कि राजनीतिक संबंधों की खटास के दौर में रिश्तों के बनने की गति मंद जरूर होती है, पर एकदम बंद नहीं होती।
रुपया या मुद्रा लोक व्यवहार का सबसे बड़ा साधन या प्रतीक है। रुपए से केवल व्यापार या विकास की गतिविधियाँ ही नहीं चलतीं। यह आत्मीय प्रसंगों में आदान-प्रदान का सबसे बड़ा साक्षी होता है। यदि सार्क देशों में 'सार्क रुपया' प्रचलन में लाने की समझदारी दक्षेस देशों की राजनीति ने अपनाई तो यह दक्षिण एशिया के सभी देशों की आपसी समझ और समन्वय को बढ़ाने वाला युगांतरकारी कदम होगा।
गरीबी, पिछड़ापन, जनसंख्या विस्फोट, अशिक्षा, कट्टरपंथ, सांप्रदायिकता और आतंकवादी गतिविधियों के विरुद्ध मनोवैज्ञानिक युद्ध खड़ा करने की जरूरत है। इन कठिन चुनौतियों को राजनीतिक और अर्थव्यवस्था के स्तर पर सुलझाने की यह पहल दक्षेस देशों की सरकारों की घरेलू चुनौतियों को भी कम करके लगभग पौने दो अरब की जनसंख्या को तनावमुक्त जीवन जीने का ऐतिहासिक कार्य करने की चुनौती के जोखिम को स्वीकार करना चाहिए।
योरप के संपन्न देश अपनी साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था से दुनिया के विकासशील और विपन्न देशों के विकास और अर्थव्यवस्था को लगातार दक्षेस देशों के आपसी बिखराव एवं अविश्वास का फायदा उठाकर अपनी योरपीयन अर्थव्यवस्था को मजबूत कर रहे हैं। हम एक-दूसरे के साथ खुले सहयोग की नीति पर चले बिना ही एक-दूसरे पर दोषारोपण की नीति पर निरंतर चलकर दुनिया की ऐसी आबादी में तब्दील होते जा रहे हैं जिसमें संभावनाएँ तो तारे तोड़ लाने की है, पर हालात यह है कि आपसी झगड़ों के कारण खुद के खेत ही बिना जुताई-बोवाई के खाली पड़े रहते हैं।
हमको साठ साल की दक्षेस देशों की राजनीति और अर्थव्यवस्था से ही सबक सीखते हुए बड़ी छलाँग लगाने के जोखिम उठाने चाहिए। जो राजनीति जोखिम उठाना नहीं जानती वो कलही हो जाती है। बेनजीर और नवाज शरीफ जोखिम उठाकर देश निकाले के भय से उठ पुनः पाकिस्तान आए और बेनजीर ने जान गँवाई, पर पाकिस्तान की अवाम को लोकतंत्र की सौगात इस जोखिम उठाने के घटनाक्रम से मिली।
नेपाल के परिवर्तनधर्मा नौजवानों ने जान का जोखिम उठाकर राजशाही को जनसहयोग से लोकतंत्र का रास्ता दिखाया। भारत, पाक, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और अफगानिस्तान की राजनीति को भी साझा मुद्रा और बिना वीसा के नागरिकों के आवागमन की स्वतंत्रता का जोखिम उठाने का समय आ गया है।

इस जोखिम को खतरे के डर से न उठाने का नतीजा इन देशों की जनता को अनंतकाल तक परस्पर अविश्वास और तनावयुक्त भयभीत जीवन बिताने के रूप में चुकाते रहना होगा। कोई यथास्थितिवादी विचार या धारा यह कह सकती है कि इस खुलेपन से आतंकवादी और स्मगलरों पर नियंत्रण नहीं रह पाएगा। पर प्रतिबंधों एवं भ्रष्टाचारयुक्त दक्षेस देशों में आतंकवादी और स्मगलरों को जिस तरह की खुलेआम ऑफ द रेकॉर्ड छूट मिली हुई है वह हमसे छिपी नहीं है।
लाखों-करोड़ों लोगों के बेरोकटोक मिलने-जुलने और लोक-व्यवहार करने के इस साझा सहयोग से करोड़ों दक्षेसवासी जब आपस में सहजता के साथ बिना भय और तनाव के आपस में मिलेंगे तो उससे दक्षेस की कमजोर राजशक्ति के साथ मजबूत लोकशक्ति भी खड़ी होगी। जिसकी ताकत को योरपीयन यूनियन तो क्या दुनिया की कोई भी महाशक्ति आँखें नहीं दिखा पाएगी। दक्षेस देशों की शक्ति का सूत्र जोखिम के साथ साझा सहयोग और समन्वय के साथीपन में है। आतंक, भय और अविश्वास की यथास्थिति में नहीं।



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