बाल दिवस 2019 : बच्चे कौन हैं, क्या चाहते हैं आपसे?


पिछले कई दिनों से खुफिया एजेंसियों की स्पष्ट चेतावनी है कि प्रधानमंत्री या बड़ी हस्तियों को निशाना बनाने के लिए आतंकी गिरोह/आईएस आदि बच्चा बम का इस्तेमाल कर सकते हैं।

ऐसे ही पिछले दिनों आतंकी हमले के शिकार एक बच्चे का फोटो वायरल हुआ था जिसमें वह कह रहा था कि मैं ऊपर भगवान को जाकर बताऊंगा सबके बारे में, बताऊंगा कि दुनिया कितनी बेकार है।

पलट कर बीते दिनों के अखबारों पर नजर डालें तो मन ज़ार-ज़ार रो उठता है नन्ही बच्चियों के साथ बढ़ती दुष्कृत्य की खबरों को पढ़कर...

यह बातें हमें सोचने पर मजबूर करती है कि क्यों इस दुनिया में सबसे ज्यादा असुरक्षित बच्चे हैं। उनके अपने कोई अधिकार क्यों नहीं है और अगर हैं भी तो वे क्यों नहीं जान पाते कि उनका इस्तेमाल कैसे करें।

बहरहाल, बच्चा यानी वह बहुत ही कम आयु का वह अबोध जो नहीं जानता कि जिंदगी क्या और मौत क्या है, बच्चा यानी जो नहीं जानता कि आतंक क्या है और इसका अंजाम क्या है। सवाल यह कि कुदरत और इंसानियत की यह सबसे खूबसूरत देन ही क्यों खौफनाक इरादों की शिकार होती है? क्या इसलिए कि महिलाओं के बाद यही सबसे 'सॉफ्ट' टारगेट होते हैं, जो अपना बचाव करने में सक्षम नहीं होते...

आईएस की धमकी को कुछ देर दरकिनार भी कर दे तो हर देश में सबसे ज्यादा छले जाने वाले बच्चे ही होते हैं। भारत में ही गांव और दूरस्थ अंचलों में कभी लापरवाही के गड्ढों में गिरते हैं बच्चे तो कभी आपसी रंजिशों में रौंदे जाते हैं बच्चे....कहीं खतरनाक कामों में झोंक दिए गए बच्चे...

उच्च से लेकर मध्य वर्ग में कहीं मां-बाप के तलाक के तनाव में सहमता है तो कभी नबंरों की चूहा दौड़ में हांफता है बचपन, मध्य वर्ग से लेकर निम्न वर्ग में कहीं मानसिक-यौन विकृति के दलदल का शिकार होता है बचपन तो कहीं प्लास्टिक बीनता-कुम्हलाता है बचपन, बाल तस्करी में कुचलता-लाचार बचपन या फिर तकनीक के अश्लील जाल में उलझता समय से पहले परिपक्व होता बचपन...तो कहीं कुपोषण से दम तोड़ता भीख मांगता बचपन तो कहीं कुप्रथाओं की बलि चढ़ता मासूम बचपन।

बचपन हमारे भविष्य की वह नींव है जिस पर राष्ट्रीय गौरव की इमारत खड़ी होनी है लेकिन परिवार से लेकर सरकारी योजनाओं तक सबसे ज्यादा यही उपेक्षित होता है।

इससे पहले कि बचपन के छीने जा रहे अधिकारों की हम चर्चा करें हमें यह जानना होगा कि बच्चे कौन हैं?

अंतरराष्ट्रीय नियम के अनुसार बच्चे का मतलब है वह व्यक्ति जिसकी उम्र 18 वर्ष से कम है। यह विश्व स्तर पर बालक की परिभाषा है जिसे बाल-अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र संघ संयोजन (यूएनसीआरसी, अंतरराष्ट्रीय कानूनी संस्था) में स्वीकार किया गया है और जिसे दुनिया के अधिकांश देशों द्वारा मान्यता दी गई है।

भारत ने हमेशा से 18 वर्ष से कम उम्र के लोगों को एक अलग कानूनी अंग के रूप में स्वीकार किया है। क्योंकि भारत में 18 वर्ष की उम्र के बाद ही कोई व्यक्ति वोट डाल सकता, ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त कर सकता या किसी अन्य कानूनी समझौते में शामिल हो सकता है।

18 वर्ष से कम उम्र की लड़की और 21 वर्ष के कम उम्र के लड़के की शादी को बाल-विवाह रोकथाम अधिनियम, 1929 के अंतर्गत निषिद्ध किया गया है। यद्यपि 1992 में यूएनसीआरसी को स्वीकार करने के बाद भारत ने अपने बाल कानून में काफी फेरबदल किया है। उसके अंतर्गत यह व्यवस्था की गई है कि वह व्यक्ति जो 18 वर्ष से कम उम्र का है और जिन्हें देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता है, वह राज्य से सुविधा प्राप्त करने का अधिकारी है।

भारत में कुछ और कानून हैं जो बालकों को अलग ढंग से परिभाषित करता है। लेकिन अब यूएनसीआरसी के प्रावधानों के अनुरूप उसमें बदलाव लाकर दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की जा रही है। जैसा कि पहले कहा गया है कानूनी रूप से बालिकाओं के वयस्क होने की उम्र 18 वर्ष और लड़के की 21 वर्ष है।

इसका यह मतलब है कि गांव या शहर में जो युवा 18 वर्ष से कम उम्र के हैं वे बालक हैं और उन्हें सहायता, समर्थन और मार्गदर्शन की जरूरत है। किंतु सच हम जानते हैं कि हमारे परिवेश में बचपन को यह तीन चीजें जिस प्रभावी रूप में मिलनी चाहिए वह कतई नहीं मिल पा रही है।

एक व्यक्ति को बच्चा उसकी उम्र ही बनाती है। कानून की विचित्रता देखिए कि यदि किसी व्यक्ति की उम्र 18 वर्ष से कम है और उसका विवाह कर दिया गया है और उसका भी बच्चा है तो उसे भी अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार बालक ही माना जाएगा।

कानून और नियमों के इस आईने में जरा निहारें अपने अपने आपको कि हम अपने आसपास के परिवेश में हंसते-खिलखिलाते बचपन के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं? कितना शोषित और कुंठित हो रहा है हमारा वह बचपन जो इस दुनिया में तो तरोताजा है लेकिन हमारी सोच, उपेक्षा या अज्ञानता ने जिसे मुरझाने के लिए बाध्य कर दिया है।

'बच्चा बम' हो या बम का शिकार बच्चा ..यौन उत्पीड़न की शिकार बच्चियां हों या स्कूल छोड़कर मां के साथ काम पर जाती बच्चियां... इस बचपन के शोषण और अत्याचार की इंतेहा है। बड़े लोगों की अलग-अलग रूप से बढ़ती दरिंदगी में दम घुट रहा है इस बचपन का, कौन सहेजेगा.... जवाब अनुत्तरित है अबोध बचपन की तरह....




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